अधिगम : अर्थ, कारक एवं प्रभावशाली विधियाँ (Learning: Meaning, Factors and Effective Methods)

 3.1 अधिगम (सीखना)


अधिगम का अर्थ होता है- सीखना। अधिगम एक प्रक्रिया है, जो जीवन-पर्यन्त चलती रहती है एवं जिसके द्वारा हम कुछ ज्ञान अर्जित करते हैं या जिसके द्वारा हमारे व्यवहार में परिवर्तन होता है। अधिगम व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है। यह जीवन लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक है।


सीखना आदतों, ज्ञान एवं अभिवृत्तियों का अर्जन है। इसमें कार्यों को करने के नवीन तरीके सम्मिलित हैं और इसकी शुरुआत व्यक्ति द्वारा किसी भी बाधा को दूर करने अथवा नवीन परिस्थितियों में अपने समायोजन को लेकर होती है।


इसके माध्यम से व्यवहार में उत्तरोत्तर परिवर्तन होते रहते हैं तथा यह व्यक्ति को अपने अभिप्राय अथवा लक्ष्य को पाने में समर्थ बनाती है।


अधिगम की परिभाषाएँ


वुडवर्थ, "नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।"


क्रो एण्ड क्रो, "सीखना आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है।"


गेट्स एवं अन्य, "सीखना अनुभव और प्रशिक्षण के द्वारा व्यवहार में होने वाला सुधारात्मक परिवर्तन है।"


हिलगार्ड, "सीखना वह प्रक्रिया है, जिसमें अभ्यास अथवा प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार का उद्भव होता है अथवा व्यवहार में परिवर्तन होता है।"


3.2 अधिगम में योगदान देने वाले कारक


अधिगम यद्यपि एक सहज क्रिया है। प्रत्येक प्राणी जन्म से ही कुछ ना कुछ सीखता रहता है। उसके सीखने की मात्रा तथा कुशलता पर अनेक कारकों का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।


अधिगम की क्रिया को प्रभावित करने वाले दो प्रमुख कारक निम्नवत् हैंl

1. व्यक्तिगत कारक


अधिगम की प्रक्रिया में विभिन्न प्रकार के व्यक्तिगत कारकों का योगदान होता है। व्यक्तिगत कारक अधिगम की प्रक्रिया को तीव्र या धीमा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अधिगम की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले व्यक्तिगत कारकों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है


(i) संवेदीकरण तथा प्रत्यक्षीकरण विद्यार्थी के सामान्य स्वास्थ्य के अतिरिक्त संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण ऐसे मनोवैज्ञानिक कारक हैं जो अधिगम में सहायता करते हैं। संवेदना प्रत्यक्षीकरण के केन्द्र में होती है। प्राणी में पाँच संवेदी अंग होते हैं, जैसे-त्वचा, कान, जिह्वा, आँखें तथा नाक। ये संवेदी अंग (ज्ञानेन्द्रियाँ) ज्ञान के द्वार होते हैं और वातावरण में स्थित विभिन्न उद्दीपनों के प्रत्यक्षीकरण में सहायक होते हैं। इनमें से किसी भी संवेदी अंग में किसी भी प्रकार का दोष हो जाने पर अधिगम पर प्रभाव पड़ता है और अन्ततोगत्वा उससे ज्ञानार्जन भी प्रभावित होता है। उदाहरणार्थ- दृष्टि में दोष; जैसे-मायोपिया (दूरदृष्टि दोष), हाइपरमैट्रोपिया (निकट दृष्टि दोष), स्टीकमेटिज्म (भेंगापन) आदि के कारण सिर दर्द, चक्कर आना तथा अध्ययन में सामान्य रूप से अरुचि होना आदि।


(ii) शारीरिक क्रियाशीलता थकान मानसिक या शारीरिक होती है और थकान का अभ्यास करने वाला छात्र अधिगम की प्रक्रिया को कम कर देता है दूसरी शारीरिक क्रियाशीलता अधिगम प्रक्रिया में सहायक होती है तथा इसकी गति को तीव्र कर देती है।


(iii) आयु तथा परिपक्वता अधिगम प्रत्यक्ष रूप से आयु तथा परिपक्वता पर निर्भर करता है। जब तक व्यक्ति सीखने के प्रति पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं होता तब तक अधिगम निष्पन्न नहीं होता। कुछ विद्यार्थी छोटी उम्र में ही अधिक सीख लेते हैं जबकि कुछ विद्यार्थी उसी पाठ्यवस्तु को सीखने में अधिक देर लगाते हैं।


वास्तविक आयु के साथ-साथ मानसिक आयु भी बढ़ती जाती है और लगभग 16 वर्ष की आयु में यह वृद्धि रुक जाती है। आयु में वृद्धि का अभिप्राय बौद्धिक परिपक्वता से होता है। जिसके द्वारा कठिन समस्याओं का समाधान करने में सहायता मिलती है। परिपक्वन का नियम हमें इस बात की चेतावनी देता है कि विद्यार्थी को जबरदस्ती तब तक अधिगम नहीं करवाना चाहिए जब तक कि वह विशिष्ट कौशलों को सीखने लायक परिपक्व न हो जाय। अध्यापकों को यह सिद्धान्त उन अभिभावकों को भी समझाना चाहिए जो अपने बच्चों को बहुत ही जल्दी विद्यालय भेजने मे अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी तथा अत्यधिक उत्साही होते हैं।

(iv) आवश्यकताएँ विद्यार्थियों की जब तक शारीरिक आवश्यकताएँ सन्तुष्ट न हो जाएँ तब तक विद्यालयों में उनसे किसी भी प्रकार के बौद्धिक चिंतन की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। एक गरीब विद्यार्थी जो कक्षा में भूखा है उसका ध्यान अध्ययन की अपेक्षा खाने की ओर अधिक केन्द्रित होगा। इसी प्रकार कक्षा में बहुत अधिक ठंड, गर्मी या कुर्सियों पर बैठने वाले विद्यार्थियों की संख्या अधिक होने पर अच्छे अधिगम की आशा नहीं की जा सकती हैं।


इसी तरह से सुरक्षा और सम्मान की आवश्यकताएँ अधिगम परिस्थितियों में शक्तिशाली प्रेरक के रूप में कार्य करती है। यदि एक विद्यार्थी अपने शिक्षक से डरता है या विद्यालय में अधिक पिटाई किए जाने के कारण असुरक्षित महसूस करता है या किसी अन्य प्रकार के दण्ड से भयभीत है तो वह सीख नहीं पाता। इसी तरह यदि उसे उत्साही, संवर्धन तथा स्नेह की आवश्यकता बहुत अधिक उत्तेजक होती है तो बच्चे का अधिगम प्रभावी होता है।


(v) व्यक्तिगत रुचियाँ व्यक्तिगत रुचियाँ भी अधिगम प्रक्रिया में योगदान करने वाला एक महत्त्वपूर्ण कारक है।


यदि किसी क्रिया कलाप में छात्र की रुचि उत्पन्न हो जाय तो शिक्षक उस दिशा में अधिक प्रयास कर सकते हैं। प्रयास किये बिना सीखना सम्भव नहीं है यदि विद्यार्थी शिक्षक के शिक्षण एवं कक्षा के क्रियाकलापों में रुचि लेते हैं तो वे कभी भी अवरोध, थकान तथा ऊब महसूस नहीं करते। प्रायः ऐसा देखा गया है कि वास्तव में थकान अधिगम क्रियाओं में रुचि की कमी से पैदा होती है। अधिक मात्रात्मक तथा अच्छी गुणवत्ता के अधिगम की प्राप्ति हेतु विद्यालयों में रुचि का अवलम्बन लेना आवश्यक है।


(vi) बुद्धि अधिगम प्रक्रिया में बुद्धि एक महत्त्वपूर्ण कारक है। बुद्धि जो बुद्धि-परीक्षा के आधार पर 1.Q. के रूप में निदर्शित की गई है, सीखने से सम्बन्धित होती है। प्रायः वे विद्यार्थी जिनका I.Q. अधिक होता है वे जल्दी सीखते हैं लेकिन विद्यार्थी का उच्च I.Q. होने मात्र से यह गारण्टी नहीं होती कि उसका सीखना भी तेजी से होगा बल्कि विद्यार्थी की आवश्यकताएँ रुचियाँ, अभिप्रेरणाएँ तथा सिखाई जाने वाली विधियाँ भी महत्त्वपूर्ण होती है।


(vii) अभिवृत्ति अधिगम की प्रक्रिया विद्यार्थी की अभिवृत्ति से भी प्रभावित होती है। यदि वह पढ़ाई जाने वाली वस्तु के प्रति सजग हो तथा उसके प्रति रुचि रखता हो तो वह निश्चित रूप से इसके प्रति उचित अभिवृत्ति रखेगा। ऐसी अभिवृत्ति उसे अधिगम परिस्थितियों को जल्दी प्रसन्नतापूर्वक कम समय में तथा प्रभावी ढंग से सीखने में सहायता करता है।


इसके विपरीत यदि वह पढ़ाई जाने वाली वस्तु में ध्यान नहीं देता या रुचि नहीं लेता तो इसकी अभिवृत्ति नकारात्मक हो जाती है। यह सामान्य अधिगम की प्रक्रिया में अवांछनीय दवाब तथा तनाव उत्पन्न करके सहज अधिगम में बाधा डालता है।


(vii) ध्यान अधिगम की क्रिया को तीव्र गति से प्रभावित करता है। कोई अध्यापक किस सीमा तक छात्रों का ध्यान आकर्षित करता है। इस पर अधिगम निर्भर करता है। ध्यान का विकास करने में शान्त वातावरण, पाठ की तैयारी, विषय में परिवर्तन, सहायक सामग्री का उपयोग, बालकों की रुचि का ध्यान, पूर्व ज्ञान का नवीन ज्ञान से सम्बन्ध, बालकों की प्रवृत्ति का ज्ञान एवं प्रोत्साहन का विशेष योग होता है।

2. पर्यावरणीय कारक


अधिगम प्रक्रिया में विभिन्न प्रकार के वातावरण सम्बन्धी कारकों का योगदान होता है। गर्भ काल के समय से ही बच्चे पर वातावरण का प्रभाव पड़ता है माँ की शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक दशाएँ माँ के गर्भ में भ्रूण के विकास को प्रभावित करती हैं। बच्चे के जन्म के बाद से बाह्य वातावरण प्रारम्भ होता है। बाह्य वातावरण घर, विद्यालय तथा पास-पड़ोस के चारों ओर के वातावरण से सम्बन्धित होता है। इन स्थानों में बच्चा परिवार के सदस्यों, अध्यापकों, साथियों, सहपाठियों, पड़ोसिय के साथ अन्तःक्रिया करता है तथा उनके साथ सम्बन्ध स्थापित करता है। समाज के सदस्य तथा अपने चारों ओर के सदस्यों के साथ के सम्बन्धों का बच्चों के विकास तथा सीखने के ढंग पर प्रभाव पड़ता है।


अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय कारक निम्न प्रकार हैं।


(1


) आस-पास का वातावरण अधिगम प्रक्रिया में आस-पास के वातावरण का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान होता है, यह मुख्यतः प्राकृतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूपों में बँटा होता है।


(ii) प्राकृतिक वातावरण प्राकृतिक वातावरण के अन्तर्गत जलवायु तथा वायुमण्डलीय दशाएँ आती हैं। ये दशाएँ अधिगम को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। यह पाया गया है कि अधिक ताप तथा आर्द्रता मानसिक क्षमता को कम करते है जिससे अधिगम प्रक्रिया रुक जाती है दूसरी ओर गर्म स्थानों में रहने वाले व्यक्तियों की बौद्धिक निष्पत्ति तथा सृजनात्मकता बहुत कम होती है इस तरह सुबह का समय हमेशा ही जटिल कार्यों को करने के लिए उचित माना जाता है। आर्द्रता तथा तापमान के बढने के कारण मानसिक क्षमता कम हो जाती है। अतः हम कह सकते हैं कि अधिगम प्रक्रिया में प्राकृतिक वातावरण एक महत्त्वपूर्ण कारक है।

(iii) सामाजिक वातावरण घर, विद्यालय तथा बच्चे के आवासीय वातावरण से सम्बन्धित होता है। घर की भौतिक दशाएँ; जैसे-बड़ा परिवार-छोटा परिवार (अध्ययन के लिए निर्धारित विशिष्ट स्थान) अपर्याप्त संवातन (वेंटिलेशन), अनुपयुक्त प्रकाश, अधिक या कम तापमान, रेडियो तथा टेलीविजन के प्रयोग के कारण शोरगुल वाला घर, शोरगुल वाला पड़ोस, लगातार सम्बन्धियों तथा मित्रों का आगमन विद्यार्थी के बौद्धिक अधिगम को प्रभावित करता है।


(iv) सांस्कृतिक पर्यावरण संस्कृति का प्रभाव सामाजिक तथा शैक्षिक संस्थाओं में प्रतिबिम्बित होता है। इसलिए बच्चों का सीखना संस्कृति की माँग तथा अपेक्षाओं के ऊपर बहुत कुछ निर्भर करता है। उदाहरण के लिए एक कृषि आधारित समुदाय की शैक्षिक प्रक्रियाएँ उन कौशलों के विकास पर केन्द्रित होती है जो कृषि समुदाय के लिए आवश्यक होती है।


(v) अध्यापक के साथ सम्बन्ध अधिगम प्रक्रिया में शिक्षक एक महत्त्वपूर्ण घटक है। वह विद्यार्थी के व्यवहार निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। वह जिस तरह पढ़ाता है तथा कक्षा मे विद्यार्थियों की व्यवस्था जिस प्रकार करता है उसका उनके अधिगम पर प्रभाव पड़ता है। अतः, यदि एक विद्यार्थी के सम्बन्ध शिक्षक से अच्छे होंगें तो इस प्रकार का वातावरण अधिगम में सहायक होता है।


( vi) अभिभावकों के साथ सम्बन्ध विद्यार्थी की अधिगम प्रक्रियाओं में


माता-पिता के साथ सम्बन्ध भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यदि बच्चे तथा माता-पिता के सम्बन्ध आपसी सम्मान और विश्वास पर आधारित होते हैं तो वह बच्चों को अच्छा स्वस्थ वातावरण प्रदान करते हैं, जिसके फलस्वरूप बच्चा अधिक सीखता है। दूसरी ओर विघटित तथा अस्वस्थ वातावरण विद्यार्थी के अधिगम में विपरीत प्रभाव डालता है। विद्यार्थी के सीखने में ऊर्ध्वगामी गतिशीलता सीखने में प्रतिरोध उत्पन्न करती है। ऐसे परिवारों में बच्चे अपने आपको असमायोजित महसूस करते हैं। अतः अभिभावकों के साथ अच्छा सम्बन्ध एक ऐसा वातावरण तैयार करता है जो अधिगम प्रक्रिया में सहायक होता है।

(vii) साथियों के साथ सम्बन्ध मित्रमण्डली के साथ स्वस्थ सम्बन्ध भी अधिगम में एक अच्छे वातावरण के निर्माण हेतु महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। कक्षा, विद्यालय तथा समाज में विद्यार्थी-विद्यार्थी के बीच के सम्बन्ध एक विशेष प्रकार के संवेगात्मक वातावरण का निर्माण करते हैं। यह वातावरण उनके आपसी सम्बन्धों पर निर्भर करता है। अच्छे सौहार्दपूर्ण आपसी सम्बन्ध कक्षा में अधिक सीखने तथा अधिक प्रतिस्पर्द्धा करने में तनाव मुक्त वातावरण का निर्माण करते हैं।


(viii) संचार माध्यम संचार माध्यम सूचनाओं के आदान-प्रदान का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जो अधिगम प्रक्रिया के अन्तर्गत एक अच्छे वातावरण को तैयार करने मे अपना विशेष योगदान दे सकते हैं। संचार माध्यमों से अधिगम को सुगम बनाया जा सकता है। संचार माध्यम मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं- मुद्रित तथा अमुद्रित संचार माध्यम। मुद्रित संचार माध्यम कम खर्चीले होते हैं तथा एक अच्छे शैक्षिक वातावरण को तैयार करने में इनका योगदान प्रारम्भ से ही लिया जा रहा है दूसरी ओर अमुद्रित संचार माध्यम महँगे होते हैं। लेकिन अधिगम प्रक्रिया को सहज बनाने में इन्होंने काफी योगदान दिया है। उदाहरण के लिए फिल्म तथा उद्दीपनों का प्रयोग प्रायः विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन या प्रयोगशाला जैसी अधिगम परिस्थितियाँ प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है।


(ix) सामाजिक वंशक्रम का ज्ञान वंशानुक्रम का महत्त्व इस दृष्टि से और भी


अधिक बढ़ जाता है कि बालक को अपने पूर्वजों से जहाँ एक ओर जैविक वंशक्रम की जानकारी प्राप्त होती है वहीं दूसरी ओर अपने पूर्वजों के सामाजिक वंशक्रम का भी ज्ञान होता है। इस प्रकार बालक को अपने पूर्वजों के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा मिलती है। वह उनके जीवन से बहुत कुछ सीखना चाहता है तथा उनके चरित्र को अपना आदर्श मानकर तदनुसार कार्य करके महान् बनने का प्रयास करता है।

(x) कक्षा का भौतिक वातावरण कक्षा का भौतिक वातावरण छात्रों के


अधिगम को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। भौतिक वातावरण के अन्तर्गत प्रकाश, वायु, कोलाहल आदि आते हैं। इस प्रकार यदि कक्षा में छात्रों के बैठने की समुचित व्यवस्था नहीं है, कमरों में अन्धेरा है, रोशनी तथा हवा का कोई प्रबन्ध नहीं है, फर्नीचर टूटा-फूटा है तथा कक्षा के बाहर कोलाहल मचा रहता है तो ऐसी स्थिति में छात्रों का मन अधिगम में नहीं लगता है, वे थोड़ी देर में थकान का अनुभव करने लगते हैं तथा इन सब बातों से उनके सीखने में बाधा उत्पन्न होती है।


3.3 अधिगम की प्रभावशाली विधियाँ


किसी नए पाठ या नई क्रिया को सीखने के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग किया जाता है।


अधिगम की प्रमुख प्रभावशाली विधियाँ निम्न हैं


1. करके सीखना इस विधि में छात्र के द्वारा प्रत्येक कार्य में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया जाता है। जब बच्चे किसी कार्य को स्वयं करते हैं तो वे उसके उद्देश्य का निर्माण करते हैं, उसको करने की योजना बनाते हैं, और उसे पूर्ण करने की कोशिश करते हैं। यदि उसमें वे असफल रहते हैं, तो अपनी गलतियों का पता लगाते हैं तथा उनमें सुधार करने का प्रयत्न करते हैं। आज की शिक्षा प्रणाली इसी विधि पर आधारित "बाल केन्द्रित" शिक्षा है।

2. अनुकरण द्वारा सीखना यह प्रक्रिया शैशवावस्था से ही प्रारम्भ हो


जाती है। विद्यालय में बच्चे शिक्षक द्वारा की जाने वाली क्रियाओं का अनुकरण करके सीखते हैं। इस विधि में शिक्षक छात्र के लिए आदर्श स्वरूप होता है।


3. निरीक्षण करके सीखना बच्चे जिस वस्तु का निरीक्षण करते हैं,


उसके बारे में वे जल्दी और स्थायी रूप से सीख जाते हैं। इसका कारण है कि निरीक्षण करते समय वे उस वस्तु को छूते हैं, या प्रयोग करते हैं, या आपस में उसके बारे में चर्चा करते हैं, इस प्रकार वे अपनी एक से अधिक इन्द्रियों का प्रयोग करते हैं। फलस्वरूप उनके मन-मस्तिष्क पर उस वस्तु का स्पष्ट चित्र अंकित हो जाता है।


निरीक्षण पद्धति में आवश्यक है कि अध्यापक बच्चों को जिस स्थान पर ले जाए, उसे वह पूर्व में ही देख ले तथा उसके बारे में योजना बना ले। इस विधि से सीखने में छात्र की जिज्ञासा एवं उत्सुकता बनी रहती है।


4. परीक्षण करके सीखना इसके अन्तर्गत छात्र अपनी आवश्यकता


के अनुरूप सामग्री का परीक्षण करते हैं तथा ज्ञान प्राप्त करते हैं; जैसे-बच्चे किताब में गिनती को पढ़ते हैं, तो प्रथम दृष्टि में उसका कोई महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं होता, परन्तु व्यावहारिक जगत में जब बच्चे स्वयं इसका प्रयोग करते हैं, देखते हैं, तो उसका अधिगम स्थायी रूप ले लेता है। इस विधि को विज्ञान, गणित, सामाजिक अध्ययन एवं नैतिक शिक्षा आदि में प्रयोग किया जा सकता है। इस विधि के माध्यम से बच्चों में आत्मनिर्भरता का विकास होता है, क्योंकि इस परीक्षण में वे स्वयं प्रयास करते हैं।


5. सामूहिक विधियों द्वारा सीखना सामूहिक विधियों द्वारा सीखना


अधिक सहायक एवं उपयोगी होता है। बालक को प्रेरणा प्रदान करने, उसे शैक्षिक लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता देने, उनके मानसिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाने, उसके व्यवहार में सुधार करने और उसमें आत्मनिर्भरता तथा सहयोग की भावनाओं का विकास करने के लिए सामूहिक विधियाँ अधिक प्रभावशाली होती हैं। मुख्य सामूहिक विधियाँ निम्नलिखित हैं


सम्मेलन व विचार गोष्ठी विधि इस विधि में किसी विशेष


विषय पर छात्र/छात्राओं द्वारा विचार-विमर्श, वाद-विवाद एक निश्चित समय में करना होता है। इसमें ऐसे प्रकरण पर विचार किया जाता है, जिसमें सभी सदस्यों की रुचि होती है। इसके द्वारा लोगों में सामाजिक एवं भावात्मक गुणों का विकास होता है। इसके द्वारा दूसरे के विरोधी विचारों का सम्मान एवं सहनशीलता की भावना विकसित होती है।


प्रोजेक्ट विधि (योजना विधि) इसमें प्रत्येक छात्र अपनी व्यक्तिगत रुचि, ज्ञान और क्षमता के अनुसार स्वतन्त्र रूप से कार्य करते हैं, जिससे सीखना सरल हो जाता है। सामूहिक रूप से कार्य करने के कारण उनमें स्पर्द्धा, सहयोग और सहानुभूति का भी विकास होता है। इसमें शिक्षक मार्गदर्शक का कार्य करते हैं तथा वह बच्चों को समूहों में बाँट देते हैं। प्रत्येक समूह अपनी इच्छानुसार कोई भी प्रोजेक्ट लेने को स्वतन्त्र होता है।

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