बाल विकास के आधार एवं उनको प्रभावित करने वाले कारक
बाल विकास में उन सभी परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है, जो बालकों में एक विकास अवस्था से दूसरी विकास अवस्था में पदार्पण करते समय होते हैं। इनमें से कुछ परिवर्तन वैयक्तिक होते हैं तथा शेष परिवर्तन सार्वभौमिक होते हैं।
बाल विकास में इन परिवर्तनों के कारणों का अध्ययन भी किया जाता है, साथ-ही-साथ यह परिवर्तन कब और किस प्रकार, किन कारकों के द्वारा घटित होते हैं, इसका भी अध्ययन किया जाता है।
बाल विकास के आधार/कारक
बाल विकास के दो मूल आधार हैं- जैविक विकास तथा सामाजिक विकास। जैविक विकास के अन्तर्गत वंशानुक्रम गतिविधियों को शामिल किया जाता है तथा सामाजिक विकास का दायित्व वातावरण पर निर्भर करता है।
वंशानुक्रम
वंशानुक्रम का सामान्य अर्थ मनुष्य के जन्मजात गुणों से होता है, ये जन्मजात गुण वह अपने माता-पिता से प्राप्त करता है।
पीटरसन के अनुसार, "व्यक्ति अपने माता-पिता के माध्यम से पूर्वजों की जो भी विशेषताएँ प्राप्त करता है, उसे वंशानुक्रम कहते हैं।"
बालक (मानव) के विकास में वंशानुक्रम आधारभूत आधार होता है; जैसे-लम्बे माता-पिता के प्रायः लम्बे बच्चे होते हैं, छोटे कद के माता-पिता के प्रायः छोटे कद के बच्चे पैदा होते हैं। बुद्धिमान माता-पिता के प्रायः बुद्धिमान बच्चे पैदा होते हैं और कम बुद्धि के माता-पिता के प्रायः कम बुद्धि के बच्चे पैदा होते हैं।
अतः वंशानुक्रम बाल विकास का जैविक आधार है।
वातावरण
वातावरण में वे सभी तत्त्व आते हैं, जिन्होंने व्यक्ति को जीवन आरम्भकरने के समय से प्रभावित किया है।
वातावरण के दो प्रमुख क्षेत्रों का बाल विकास पर प्रभाव पड़ता है-एक प्रकृति और दूसरा समाज अर्थात् प्राकृतिक वातावरण से तात्पर्य स्थान
विशेष की प्राकृतिक विशेषताओं नदी, पहाड़, वायु, तापमान, अवस्थिति आदि से होता है। सामाजिक वातावरण से तात्पर्य व्यक्ति विशेष की उन पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों जिनमें वह रहता है, से होता है।
बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक
बालक का विकास मूल रूप से उसके वंशानुक्रम और पर्यावरण पर निर्भर करता है। इसलिए विकास के कारकों को दो भागों में विभाजित किया जाता है- वंशानुक्रमीय कारक और पर्यावरणीय कारक।
वंशानुक्रमीय कारक
बालक के विकास के निम्न प्रमुख वंशानुक्रमीय कारक होते हैं
पारिवारिक कारक
बालक का विकास वंशानुक्रम (Heredity) में उपलब्ध गुण एवं क्षमताओं पर निर्भर रहता है। गर्भधारण करने के साथ ही बालक में पैतृक कोषों का विकास आरम्भ हो जाता है तथा यहीं से बालक की बुद्धि एवं विकास की सीमाएँ सुनिश्चित हो जाती हैं।
ये पैतृक गुण पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होते रहते हैं। बालक के कद, आकृति, बुद्धि, चरित्र आदि को भी वंशानुक्रम सम्बन्धी विशेषताएँ प्रभावित करती हैं।
लिंग
बालकों के शारीरिक एवं मानसिक विकास में लिंग भेद का प्रभाव भी पड़ता है। जन्म के समय बालकों का आकार बड़ा होता है। किन्तु बाद में बालिकाओं में शारीरिक विकास की गति तीव्र होती है।
इसी प्रकार बालिकाओं में मानसिक एवं यौन परिपक्वता बालकों से पहले आ जाती है।
अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ
बालक के शरीर में अनेक अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ होती हैं, जिनमें से विशेष प्रकार के रस का स्राव होता है। यही रस बालक के विकास को प्रभावित करता है।
यदि ये ग्रन्थियाँ रस का स्राव ठीक प्रकार से न करें, तो बालक का विकास अवरुद्ध हो जाता है। उदाहरण के लिए एड्रीनल ग्रन्थि से स्रावित रस (थाइरॉक्सिन) बालक के कद को प्रभावित करता है। इसके स्रावित न होने पर बालक बौना रह जाता है।
बुद्धि
मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों के आधार पर निश्चित किया है कि कुशाग्रबुद्धि वाले बालकों का शारीरिक एवं मानसिक विकास मन्दबुद्धि वालों की अपेक्षा अधिक तेज गति से होता है।
कुशाग्रबुद्धि बालक शीघ्र बोलने एवं चलने लगते हैं। प्रतिभाशाली बालक 11 माह में, सामान्य बुद्धि बालक 16 माह की आयु में और मन्द बुद्धि बालक 24 माह की आयु में बोलना सीखता है।
गर्भावस्था के दौरान माता का स्वास्थ्य एवं परिवेश
गर्भावस्था में माता को अच्छा मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने की सलाह इसलिए दी जाती है कि उससे न केवल गर्भ के अन्दर बालक के विकास पर असर पड़ता है, बल्कि आगे के विकास की बुनियाद भी मजबूत होती है।
शारीरिक गुण
जो बालक जन्म से ही दुबले-पतले, कमजोर, बीमार तथा किसी प्रकार की शारीरिक समस्या से पीड़ित रहते हैं, उनकी तुलना में सामान्य एवं स्वस्थ बच्चे का विकास अधिक होना स्वाभाविक ही है।
शारीरिक कमियों का स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि वृद्धि एवं विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पर्यावरणीय कारक
बालक के विकास के निम्न प्रमुख पर्यावरणीय कारक होते हैं
1. सामाजिक कारक मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसलिए उस पर समाज का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। सामाजिक व्यवस्था, रहन-सहन, परम्पराएँ, धार्मिक कृत्य, रीति-रिवाज, पारस्परिक अन्तःक्रिया और सम्बन्ध आदि बहुत-से तत्व हैं, जो मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, एवं बौद्धिक विकास को किसी-न-किसी रूप से अवश्य प्रभावित करते हैं।
2. जीवन की घटनाएँ जीवन की घटनाओं का भी बालक के जीवन पर प्रभाव पड़ता है। यदि बालक के साथ अच्छा व्यवहार हुआ है, तो उसके विकास की गति सही होगी अन्यथा उसके विकास पर प्रतिकूल हो, वह माँ के प्यार से वंचित हो जाएगा। ऐसी स्थिति में उसका प्रभाव पडेगा। जिस बच्चे को उसकी माता ने बचपन में ही छोड दिया सर्वांगीण विकास प्रभावित होता है।
3. भौतिक वातावरण बालक का जन्म किस परिवेश में हुआ, वह किस परिवेश में किन लोगों के साथ रह रहा है? इन सबका प्रभाव उसके विकास पर पड़ता है। परिवेश की कमियों, प्रदूषणों, भौतिक सुविधाओं का अभाव इत्यादि कारणों से भी बालक का विकास प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है।
4. सामाजिक-आर्थिक स्थिति बालक के परिवार की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का प्रभाव भी उसके विकास पर पड़ता है। निर्धन परिवार के बच्चे को विकास के अधिक अवसर उपलब्ध नहीं होते। अच्छे विद्यालय में पढ़ने, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने आदि का अवसर आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को नहीं मिलता, इसके कारण उनका विकास सन्तुलित नहीं होता। शहर के अमीर बच्चों को गाँवों के गरीब बच्चों की तुलना में बेहतर सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण मिलता है, जिसके कारण उनका मानसिक एवं सामाजिक विकास स्वाभाविक रूप से अधिक होता है।
पोषण
यह वृद्धि तथा विकास का महत्त्वपूर्ण घटक होता है। बालकों के विकास के लिए उचित मात्रा में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। यदि हमारे खान-पान में उपयुक्त पोषक तत्वों की कमी होगी, तो वृद्धि एवं विकास इससे प्रभावित होगा।
सन् 1955 में वाटरलू ने अफ्रीका एवं भारत में विकास पर कुपोषण के प्रभाव का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला था कि कुपोषण से बालकों का शारीरिक एवं मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है।
विद्यालय का वातावरण
बाल विकास पर विद्यालय का कई कारणों से प्रभाव पड़ता है। किसी विद्यालय में शिक्षा व्यवस्था, शिक्षण ढंग, पठन-पाठन की सामग्री, समय विभाजन चक्र, स्वास्थ्य निरीक्षण, प्रार्थना सभा आदि बालक के विकास में अति महत्त्वपूर्ण हैं। अतः विद्यालय का वातावरण एवं परिस्थितियाँ बालक के विकास को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण कारक हैं।
संचार माध्यम
समाज अपने समुदाय एवं अन्य व्यक्तियों के प्रति निरन्तर अन्तः प्रक्रियाएँ करता रहता है। इस अन्तः प्रतिक्रिया का व्यापक आधार संचार व सम्प्रेषण है, जिसका प्रभाव बालकों के विकास पर होता है। संचार व जनसंचार बच्चों में प्रेरणा, सृजनात्मकता बढ़ाने और उच्च स्तरीय शिक्षण प्रदान करने में सहायता प्रदान करता है।

