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TET For Primary Teachers Good News: इन सभी शिक्षकों के लिए टेट जरूरी नहीं, जानें पूरा नियम, 23 अगस्त 2010 का नियम क्यों है अहम?

शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे लाखों उम्मीदवारों के बीच लंबे समय से एक बड़ा सवाल बना हुआ था—क्या हर शिक्षक के लिए टीईटी (TET) पास करना अनिवार्य है या कुछ मामलों में इससे छूट भी मिल सकती है?

 खासकर वे अभ्यर्थी, जिनकी भर्ती प्रक्रिया वर्ष 2010 से पहले शुरू हुई थी, उनके लिए यह मुद्दा काफी महत्वपूर्ण था। अब इस पूरे मामले पर स्थिति काफी हद तक साफ हो चुकी है।


23 अगस्त 2010 का नियम क्यों है अहम?

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) ने 23 अगस्त 2010 को एक महत्वपूर्ण नियम लागू किया था। इस नियम के तहत कक्षा 1 से 5 तक पढ़ाने के लिए डीएलएड (D.El.Ed) और कक्षा 6 से 8 तक के लिए बीएड (B.Ed) अनिवार्य किया गया। 

इसके साथ ही टीईटी (Teacher Eligibility Test) पास करना भी जरूरी कर दिया गया।

इस फैसले का मुख्य उद्देश्य पूरे देश में शिक्षकों की गुणवत्ता को एक समान बनाए रखना था, ताकि योग्य और प्रशिक्षित शिक्षक ही नियुक्त किए जा सकें। इसके बाद सभी राज्यों को निर्देश दिया गया कि वे इसी नियम के अनुसार शिक्षक भर्ती प्रक्रिया अपनाएं।

2013 के पत्र में मिली बड़ी राहत

सितंबर 2013 में जारी एक आधिकारिक पत्र में इस विषय को और स्पष्ट किया गया। इस पत्र में बताया गया कि किन परिस्थितियों में टीईटी अनिवार्य है और किन मामलों में छूट दी जा सकती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि यदि किसी राज्य में शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया या विज्ञापन 23 अगस्त 2010 से पहले जारी किया गया था, तो ऐसे मामलों में टीईटी अनिवार्य नहीं होगा। 

इसका मतलब है कि पुराने विज्ञापन के आधार पर चयनित होने वाले अभ्यर्थियों को टीईटी से छूट मिल सकती है।

त्रिपुरा का उदाहरण समझिए

इस संदर्भ में त्रिपुरा राज्य का उदाहरण दिया गया, जहां 2002, 2006 और 2009 में शिक्षक भर्ती के विज्ञापन जारी हुए थे। इन भर्तियों के लिए टीईटी को अनिवार्य नहीं माना गया। 

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराने नियमों के तहत शुरू हुई चयन प्रक्रिया पर नया टीईटी नियम लागू नहीं होगा।

2001 और 2012 के नियमों से भी राहत

पत्र में यह भी बताया गया कि 2010 से पहले की सभी भर्तियों को वर्ष 2001 के नियमों के आधार पर मान्यता दी जाएगी। उस समय टीईटी अनिवार्य नहीं था।

इसके अलावा 18 जून 2012 को सरकार द्वारा कुछ राज्यों को अतिरिक्त समय दिया गया था। उदाहरण के तौर पर त्रिपुरा को 31 मार्च 2015 तक की छूट दी गई थी। 

हालांकि इसके साथ एक शर्त भी जोड़ी गई—ऐसे शिक्षकों को नियुक्ति के बाद 2 वर्षों के भीतर आवश्यक योग्यता पूरी करनी होगी।

राज्यों की जिम्मेदारी और अंतिम निष्कर्ष

इस पूरे मामले में यह साफ किया गया है कि राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे नियमों के अनुसार शिक्षक भर्ती करें। साथ ही, जिन शिक्षकों को छूट के आधार पर नियुक्त किया गया है, उन्हें निर्धारित समय के भीतर अपनी योग्यता पूरी करनी होगी।

निष्कर्ष के रूप में, यह कहा जा सकता है कि टीईटी की अनिवार्यता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि भर्ती प्रक्रिया कब शुरू हुई थी। यदि चयन प्रक्रिया 23 अगस्त 2010 से पहले शुरू हुई है, तो टीईटी जरूरी नहीं है। वहीं, इसके बाद की सभी भर्तियों में टीईटी पास करना अनिवार्य कर दिया गया है।

इस स्पष्टता के बाद अब उम्मीदवारों के बीच बना भ्रम काफी हद तक दूर हो गया है और वे अपने करियर की दिशा को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

UPTET Online Form 2026, यूपी टीईटी आवेदन लिंक एक्टिव, फीस, आवेदन तिथि देखें

उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग (UPESSC) ने आज, 27 मार्च 2026 से UPTET Online Form 2026 के लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शुरू कर दी है। शिक्षक बनने के इच्छुक उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट upessc.up.gov.in के माध्यम से UPTET 2026 Registration पूरा कर सकते हैं। आयोग ने अभ्यर्थियों को सतर्क करते हुए बताया है कि “uptet2026.in” एक फर्जी वेबसाइट है, इसलिए केवल आधिकारिक पोर्टल से ही UPTET Application Form 2026 भरें। 


आवेदन की अंतिम तिथि 26 अप्रैल 2026 निर्धारित की गई है, जबकि उम्मीदवार 1 मई 2026 तक अपने फॉर्म में सुधार कर सकेंगे। यह परीक्षा उत्तर प्रदेश में शिक्षक बनने का महत्वपूर्ण अवसर है, इसलिए सभी अभ्यर्थी समय पर UPTET Exam 2026 के लिए आवेदन अवश्य करें।

यूपी टीईटी आवेदन फॉर्म 2026 डाउनलोड लिंक

UPTET Online Form 2026 का इंतजार कर रहे अभ्यर्थियों के लिए बड़ी अपडेट है। उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग (UPESSC) ने 20 मार्च 2026 को नोटिफिकेशन जारी कर दिया है और ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 27 मार्च 2026 से शुरू हो चुकी है। अभ्यर्थी आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से 26 अप्रैल 2026 तक आवेदन कर सकते हैं। 

आवेदन शुल्क की बात करें तो General/OBC के लिए लगभग ₹600 (एक पेपर) और ₹1200 (दो पेपर) जबकि SC/ST के लिए ₹400 और PwD के लिए ₹100 निर्धारित है। इस बार One Time Registration (OTR) सिस्टम भी लागू किया गया है। परीक्षा का आयोजन 2, 3 और 4 जुलाई 2026 को होगा, इसलिए उम्मीदवार समय रहते आवेदन अवश्य करें।


यूपीटीईटी 2026 (Uttar Pradesh Teacher Eligibility Test) 

राज्य स्तर की एक महत्वपूर्ण पात्रता परीक्षा है, जिसे उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा बोर्ड (UPBEB) द्वारा आयोजित किया जाता है। यह परीक्षा उन उम्मीदवारों के लिए अनिवार्य है जो प्राथमिक (Class 1-5) और उच्च प्राथमिक (Class 6-8) स्तर पर शिक्षक बनना चाहते हैं। 

परीक्षा ऑफलाइन मोड में आयोजित की जाती है और इसमें सफल होने के बाद प्रमाण पत्र की वैधता आजीवन रहती है। नीचे दी गई तालिका में UP TET 2026 से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण जानकारियों को अपडेटेड रूप में प्रस्तुत किया गया है।

यूपीटीईटी आवेदन प्रक्रिया के लिए आवश्यक दस्तावेज़

UPTET 2026 के लिए आवेदन करते समय उम्मीदवारों को पहले से सभी जरूरी दस्तावेज़ तैयार रखना बेहद महत्वपूर्ण है। सही और वैध दस्तावेज़ों के बिना आवेदन प्रक्रिया अधूरी मानी जा सकती है या फॉर्म रिजेक्ट भी हो सकता है। 

ऑनलाइन आवेदन के दौरान उम्मीदवारों को अपनी शैक्षिक योग्यता, पहचान और अन्य जरूरी जानकारी अपलोड करनी होती है। इसलिए सभी प्रमाण पत्र स्कैन करके निर्धारित फॉर्मेट में तैयार रखें।

 नीचे UPTET आवेदन के लिए जरूरी दस्तावेज़ों की पूरी सूची दी गई है:

आधार कार्ड

10वीं की मार्कशीट

12वीं की मार्कशीट

ग्रेजुएशन की मार्कशीट

प्रशिक्षण (D.El.Ed/B.Ed) प्रमाण पत्र

जाति प्रमाण पत्र (यदि लागू हो)

पासपोर्ट साइज फोटो

हस्ताक्षर (Signature)

पहचान प्रमाण (ID Proof जैसे वोटर ID/पैन कार्ड)

यूपीटीईटी में आवेदन के लिए योग्यता 2026 (Primary & Upper Primary)

UPTET 2026 के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के लिए शैक्षिक एवं व्यावसायिक योग्यताओं को समझना बेहद जरूरी है। प्राथमिक (कक्षा 1–5) और उच्च प्राथमिक (कक्षा 6–8) शिक्षकों के लिए अलग-अलग पात्रता मानदंड निर्धारित किए गए हैं, जिन्हें National Council for Teacher Education (NCTE) द्वारा तय किया जाता है।

 उम्मीदवारों को अपनी शैक्षणिक डिग्री के साथ मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण कोर्स होना अनिवार्य है। सही योग्यता होने पर ही उम्मीदवार UPTET परीक्षा में शामिल हो सकते हैं। 


UP TET Application Form 2026: आवेदन प्रक्रिया

UP TET 2026 के लिए आवेदन प्रक्रिया ऑनलाइन माध्यम से पूरी की जाती है, जिसमें उम्मीदवारों को निर्धारित चरणों का पालन करना होता है। आवेदन करने से पहले उम्मीदवारों को अपनी पात्रता सुनिश्चित करनी चाहिए और आवश्यक दस्तावेज तैयार रखने चाहिए। सबसे पहले OTR (One Time Registration) प्रक्रिया पूरी करनी होती है, जिसके बाद ही आवेदन फॉर्म भरा जा सकता है। सही जानकारी भरना और दस्तावेज़ अपलोड करना बेहद जरूरी है, क्योंकि किसी भी गलती से आवेदन निरस्त हो सकता है। इसलिए उम्मीदवारों को आवेदन प्रक्रिया को ध्यानपूर्वक और चरणबद्ध तरीके से पूरा करना चाहिए।


UPESSC की आधिकारिक वेबसाइट upessc.up.gov पर जाएं।


आवेदन से पहले अपनी बेसिक जानकारी देकर OTR (One Time Registration) प्रक्रिया पूरी करें।

रजिस्ट्रेशन क्रेडेंशियल की मदद से लॉग इन करें।

आवेदन फॉर्म में व्यक्तिगत जानकारी और शैक्षणिक योग्यता भरें।

परीक्षा का स्तर (Primary/Upper Primary) चुनें।

निर्देशानुसार आवश्यक दस्तावेज़ अपलोड करें।

निर्धारित आवेदन शुल्क का ऑनलाइन भुगतान करें।

सभी विवरण को ध्यान से जांचें और फॉर्म सबमिट करें।

भविष्य के लिए आवेदन फॉर्म का प्रिंट आउट सुरक्षित रखें।


यूपी टीईटी Story फ़ॉर्म 2026: महत्वपूर्ण तिथियां

यूपीटीईटी परीक्षा 2026 की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण तिथियों की जानकारी होना बेहद जरूरी है। सही समय पर आवेदन, फीस भुगतान और एडमिट कार्ड डाउनलोड करना परीक्षा प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। यदि उम्मीदवार किसी भी महत्वपूर्ण तारीख को मिस कर देते हैं, तो वे आवेदन से वंचित हो सकते हैं। इसलिए सभी अभ्यर्थियों को सलाह दी जाती है कि वे आधिकारिक शेड्यूल के अनुसार अपनी तैयारी और आवेदन प्रक्रिया पूरी करें। 

यूपी टीईटी 2026 आवेदन शुल्क

UP TET 2026 के लिए आवेदन करते समय उम्मीदवारों को निर्धारित श्रेणी के अनुसार आवेदन शुल्क का भुगतान करना होता है। यह शुल्क Paper I (प्राथमिक स्तर) और Paper II (उच्च प्राथमिक स्तर) दोनों के लिए अलग-अलग या समान हो सकता है। आवेदन शुल्क का भुगतान ऑनलाइन माध्यम से किया जाता है, जैसे डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या नेट बैंकिंग। उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे अपनी श्रेणी के अनुसार सही शुल्क का भुगतान करें, क्योंकि गलत भुगतान से आवेदन फॉर्म निरस्त हो सकता है।


सामान्य / ईडब्ल्यूएस / ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क ₹1000 है (Paper I और Paper II दोनों के लिए)।

एससी / एसटी वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क ₹500 निर्धारित किया गया है।

दिव्यांग (PwD) उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क ₹300 है।

आवेदन शुल्क Paper I और Paper II दोनों के लिए समान रखा गया है।

शुल्क का भुगतान ऑनलाइन माध्यम (Debit Card / Credit Card / Net Banking) से किया जाता है।

आवेदन शुल्क एक बार जमा करने के बाद वापस नहीं किया जाता है।

अंतिम तिथि से पहले शुल्क जमा करना अनिवार्य है, अन्यथा आवेदन मान्य नहीं होगा।

उम्मीदवारों को भुगतान रसीद (Payment Receipt) सुरक्षित रखनी चाहिए।

UPTET 2026 उत्तर प्रदेश में शिक्षक बनने के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। सही समय पर आवेदन करना, निर्धारित दस्तावेज़ तैयार रखना और शैक्षणिक एवं व्यावसायिक योग्यताओं को पूरा करना बेहद आवश्यक है।

 ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया (OTR + आवेदन फॉर्म) को सावधानीपूर्वक पूरा करें और केवल आधिकारिक वेबसाइट upessc.up.gov.in का ही उपयोग करें। समय पर शुल्क का भुगतान करना और एडमिट कार्ड डाउनलोड करना भी जरूरी है। इस परीक्षा में सफल होने के बाद उम्मीदवार प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर शिक्षक पद के लिए पात्र हो जाएंगे, और प्रमाण पत्र की वैधता आजीवन रहेगी।


यूपी टीईटी आवेदन फ़ॉर्म 2026: FAQs

प्रश्न: UPTET 2026 के लिए आवेदन की अंतिम तिथि क्या है?

उत्तर: UPTET 2026 के लिए ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि 26 अप्रैल 2026 है।

प्रश्न: आवेदन शुल्क कितनी राशि है और कैसे भुगतान करें?

उत्तर: सामान्य / OBC / EWS – ₹1000, SC/ST – ₹500, PwD – ₹300। भुगतान ऑनलाइन माध्यम से किया जा सकता है (डेबिट/क्रेडिट कार्ड या नेट बैंकिंग)।

प्रश्न: UPTET परीक्षा में कौन-कौन से स्तर शामिल हैं?

उत्तर: UPTET 2026 में प्राथमिक (Class 1-5) और उच्च प्राथमिक (Class 6-8) स्तर शामिल हैं।

प्रश्न: क्या उम्मीदवार फर्जी वेबसाइट के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं?

उत्तर: नहीं। केवल आधिकारिक वेबसाइट upessc.up.gov.in से ही आवेदन करें। “uptet2026.in” जैसी वेबसाइट फर्जी है।

प्रश्न: UPTET प्रमाण पत्र की वैधता कितनी है?

उत्तर: परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर प्रमाण पत्र की वैधता आजीवन रहती है।

प्रश्न: UPTET 2026 के लिए ऑनलाइन आवेदन तिथि क्या है?

उत्तर: UPTET 2026 के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 27 मार्च 2026 से शुरू हो चुकी है और आवेदन करने की अंतिम तिथि 26 अप्रैल 2026 निर्धारित की गई है। उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।


अध्याय 1;- बाल विकास : अर्थ, आवश्यकता, क्षेत्र एवं अवस्थाएँ Child Development : Meaning, Necessity, Domain and Stages

  1 बाल विकास का अर्थ

बाल विकास का सामान्य अर्थ होता है- बालकों का मानसिक व शारीरिक विकास अर्थात् बालकों का सर्वांगीण विकास। बाल विकास शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संज्ञानात्मक, भाषायी तथा धार्मिक आदि रूपों में होता है। बाल विकास का सम्बन्ध गुणात्मक (कार्य कुशलता, ज्ञान, तर्क, नवीन विचारधारा) एवं परिमाणात्मक (लम्बाई में वृद्धि, भार में वृद्धि तथा अन्य) दोनों से है।

बाल विकास के अन्तर्गत शिक्षकों को एक निश्चित आयु के सामान्य बालकों को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक परिपक्वता का ज्ञान होना आवश्यक है, जिससे वे उनकी क्रियाओं को नियन्त्रित करके अपेक्षित दिशा प्रदान कर सकें।


रिक के अनुसार, "विकास एक क्रमिक एवं मन्दगति से चलने वाली प्रक्रिया है।"

क्रो एण्ड क्रो के अनुसार, "बाल विकास वह विज्ञान है, जो बालक के व्यवहार का अध्ययन गर्भावस्था से मृत्यु पर्यन्त तक करता है।"

हरलॉक के अनुसार, "बाल विकास मनोविज्ञान की वह शाखा है, जो गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक होने वाले मनुष्य के विकास के विभिन्न अवस्थाओं में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करती है।"

2 बाल विकास की आवश्यकता

आधुनिक युग में बाल विकास का अध्ययन कई रूप से महत्त्वपूर्ण है। इस दिशा में हुए अध्ययनों से न केवल बालकों का ही कल्याण हुआ है, बल्कि माता-पिता को बालकों को समझने में बहुत सुविधा भी मिली है तथा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मानव समाज का कल्याण हुआ है। मनोविज्ञान की शाखा बाल विकास के अध्ययन से बालकों के जीवन को सुखी ही नहीं बनाया जा सकता है, बल्कि उनके व्यवहार को प्रशंसनीय और उनके जीवन को समृद्धिशाली भी बनाया जा सकता है। इस विषय के अध्ययन की आवश्यकता शिक्षक, बाल चिकित्सक, बाल सुधारक आदि सभी को होती है। इस विषय की आवश्यकता निम्न रूप से समाज में हो सकती है

बालकों के स्वभाव को समझने में उपयोगी

बालकों के शिक्षण एवं शिक्षा में उपयोगी

बालकों के विकास को समझने में सहायक

बालकों के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने में सहायक

बालकों के व्यक्तित्व विकास को समझने में उपयोगी

बालकों के व्यवहार के नियन्त्रण में सहायक

बाल निर्देशन में सहायक

बाल व्यवहार के सम्बन्ध में पूर्वकथन करने में सहायक

सुखी पारिवारिक जीवन बनाने में सहायक।

.3 बाल विकास के क्षेत्र

बाल विकास का क्षेत्र अत्यन्त ही विस्तृत एवं व्यापक है। यह बालक के विकास के सभी आयाम, स्वरूप, असामान्यताओं, शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तनों तथा उनको प्रभावित करने वाले सभी तत्त्वों का अध्ययन करता है। बाल विकास के विषय क्षेत्र के अन्तर्गत निम्न क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है

बाल विकास की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन

बाल विकास के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन

बाल विकास को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का अध्ययन

बालकों की विभिन्न असामान्यताओं का अध्ययन

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अध्ययन

बाल व्यवहारों और अन्तः क्रियाओं का अध्ययन

बालकों की रुचियों का अध्ययन

बालकों की विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन

बालकों की वैयक्तिक भिन्नताओं का अध्ययन

बालकों के व्यक्तित्व का मूल्यांकन

बालक-अभिभावक सम्बन्धों का अध्ययन आदि।

4 बाल विकास की अवस्थाएँ

मानव विकास एक सतत् प्रक्रिया है। शारीरिक विकास तो एक सीमा (परिपक्वता प्राप्त करने) के बाद रुक जाता है, किन्तु मनोशारीरिक क्रियाओं में विकास निरन्तर होता रहता है। इन मनोशारीरिक क्रियाओं के अन्तर्गत मानसिक, भाषायी, संवेगात्मक, सामाजिक एवं चारित्रिक विकास आते हैं। इनका विकास विभिन्न आयु स्तरों में भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है। इन आयु स्तरों को मानव विकास की अवस्थाएँ कहते हैं।

भारतीय मनीषियों ने मानव विकास की अवस्थाओं को सात कालों में विभाजित किया है

1. गर्भावस्था

गर्भाधान से जन्म तक

2. शैशवावस्था

जन्म से 5 वर्ष तक

3. बाल्यावस्था

5 वर्ष से 12 वर्ष तक

4. किशोरावस्था

12 वर्ष से 18 वर्ष तक

5. युवावस्था

18 वर्ष से 26 वर्ष तक)

6. प्रौढ़ावस्था

25 वर्ष से 55 वर्ष तक

7. वृद्धावस्था

55 वर्ष से मृत्यु तक

इस समय अधिकतर विद्वान् मानव अवस्थाओं के अन्तर्गत करते हैं विकास का अध्ययन निम्नलिखित चार अवस्थाओं में होने वाले मानव विकास का अध्ययन किया जाता है।

1. शैशवावस्था

जन्म से 6 वर्ष तक

2. बाल्यावस्था

6 वर्ष से 12 वर्ष तक

3. किशोरावस्था

12 वर्ष से 18 वर्ष तक

4. वयस्कावस्था

18 वर्ष से मृत्यु तक

शिक्षा की दृष्टि से प्रथम तीन अवस्थाएँ महत्त्वपूर्ण हैं, इसलिए बाल विकास में इन्हीं तीन अवस्थाओं में होने वाले मानव विकास का अध्ययन किया जाता है।

शैशवावस्था

जन्म से 6 वर्ष तक की अवस्था को शैशवावस्था कहा जाता है। इसमें जन्म से 3 वर्ष तक बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास तेजी से होता है। शैशवावस्था में अनुकरण एवं दोहराने की तीव्र प्रवृत्ति बच्चों में पाई जाती है। इसी काल में बच्चों का समाजीकरण भी प्रारम्भ हो जाता है। इस काल में जिज्ञासा की तीव्र प्रवृत्ति बच्चों में पाई जाती है। मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से यह काल भाषा सीखने की सवर्वोत्तम अवस्था है। इन्हीं सब कारणों से यह काल शिक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

बाल्यावस्था

6 वर्ष से 12 वर्ष तक की अवस्था को बाल्यावस्था कहा जाता है। बाल्यावस्था के प्रथम चरण 6 से 9 वर्ष में बालकों की लम्बाई एवं भार दोनों बढ़ते हैं। इस काल में बच्चों में चिन्तन एवं तर्क शक्तियों का विकास हो जाता है। इस काल के बाद से बच्चे पढ़ाई में रुचि लेने लगते हैं। शैशवावस्था में बच्चे जहाँ बहुत तीव्र गति से सीखते हैं, वहीं बाल्यावस्था में सीखने की गति मन्द हो जाती है, किन्तु उनके सीखने का क्षेत्र शैशवावस्था की तुलना में विस्तृत हो जाता है। मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से इस अवस्था में बच्चों की शिक्षा के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग करना चाहिए।

किशोरावस्था

12 वर्ष से 18 वर्ष तक की अवस्था को किशोरावस्था कहा जाता है। यह वह समय होता है, जिसमें व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर उन्मुख होता है। इस अवस्था में किशोरों की लम्बाई एवं भार दोनों में वृद्धि होती है, साथ ही मांसपेशियों में भी वृद्धि होती है। 12-14 वर्ष की आयु के बीच लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की लम्बाई एवं मांसपेशियों में तेजी से वृद्धि होती है एवं 14-18 वर्ष की आयु के बीच लड़कियों की अपेक्षा लड़कों की लम्बाई एवं मांसपेशियाँ तेजी से बढ़ती हैं। इस काल में प्रजनन अंग विकसित होने लगते हैं एवं उनकी काम की मूल प्रवृत्ति जागृत होती है। इस अवस्था में किशोर-किशोरियों की बुद्धि का पूर्ण विकास हो जाता है, उनके ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता बढ़ जाती है, स्मरण शक्ति बढ़ जाती है एवं उनमें स्थायित्व आने लगता है। इस अवस्था में मित्र बनाने की प्रवृत्ति तीव्र होती है एवं मित्रता में प्रगाढ़ता भी इस दौरान सामान्य-सी बात है।

5 विकास के विभिन्न आयाम

बाल विकास को वैसे तो कई आयामों में विभाजित किया जा सकता है, किन्तु बाल विकास एवं बाल-मनोविज्ञान के अध्ययन के दृष्टिकोण से 

निम्नलिखित आयाम महत्त्वपूर्ण हैं

शारीरिक विकास

इसके अन्तर्गत बालक के शरीर के बाह्य एवं आन्तरिक अवयवों का विकास शामिल है। शरीर के बाह्य परिवर्तन; जैसे-ऊँचाई, शारीरिक अनुपात में वृद्धि इत्यादि स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। आन्तरिक अवयवों के परिवर्तन बाह्य रूप से दिखाई तो नहीं पड़ते, किन्तु शरीर के भीतर इनक समुचित विकास होता रहता है।

शारीरिक वृद्धि एवं विकास की प्रक्रिया व्यक्तित्व के उचित समायोजन और विकास के मार्ग में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रारम्भ में शिशु अपने हर प्रकार के कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है, धीरे-धीरे विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम होता जाता है।

शारीरिक वृद्धि एवं विकास पर बालक के आनुवंशिक गुणों का प्रभाव देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त बालक के परिवेश एवं उसकी देखभाल का भी शारीरिक वृद्धि एवं विकास पर प्रभाव पड़ता है।

मानसिक विकास

मानसिक विकास से तात्पर्य बालक की उन सभी मानसिक योग्यताओं एवं क्षमताओं में वृद्धि और विकास से है, जिसके परिणामस्वरूप वह अपने निरन्तर बदलते हुए वातावरण में ठीक प्रकार समायोजन करता है और विभिन्न प्रकार की समस्याओं को सुलझाने में अपनी मानसिक शक्तियों का पर्याप्त उपयोग कर पाता है।

कल्पना करना, स्मरण करना, विचार करना, निरीक्षण करना, समस्या समाधान करना, निर्णय लेना, इत्यादि की योग्यता संज्ञानात्मक विकास के फलस्वरूप ही विकसित होते हैं। जन्म के समय बालक में इस प्रकार की योग्यता का अभाव होता है, धीरे-धीरे आयु बढ़ने के साथ-साथ उसमें मानसिक विकास की गति भी बढ़ती रहती है।

संज्ञानात्मक विकास

शिक्षकों को संज्ञानात्मक विकास की पर्याप्त जानकारी इसलिए होनी चाहिए, क्योंकि इसके अभाव में वह बालकों की इससे सम्बन्धित समस्याओं का समाधान नहीं कर पाएगा। यदि कोई बालक मानसिक रूप से कमजोर है, तो इसके क्या कारण हैं, यह जानना उसके उपचार के लिए आवश्यक है।

संज्ञानात्मक विकास के बारे में पर्याप्त जानकारी होने से विभिन्न आयु स्तरों पर पाठ्यक्रम, सहगामी क्रियाओं तथा अनुभवों के चयन और नियोजन में सहायता मिलती है। किस विधि और तरीके से पढ़ाया जाए, सहायक सामग्री तथा शिक्षण साधन का प्रयोग किस तरह किया जाए, शैक्षणिक वातावरण किस प्रकार का हो, इन सबके निर्धारण में संज्ञानात्मक विकास के विभिन्न पहलुओं की जानकारी शिक्षकों के लिए सहायक साबित होती है।

भाषायी विकास

भाषा का विकास एक प्रकार का संज्ञानात्मक विकास ही है। मानसिक योग्यता की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। भाषा का तात्पर्य होता है वह सांकेतिक साधन, जिसके माध्यम से बालक अपने विचारों एवं भावों का सम्प्रेषण करता है तथा दूसरों के विचारों एवं भावों को समझता है।

अभिव्यक्ति क्षमता का विकास

भाषायी योग्यता के अन्तर्गत मौखिक अभिव्यक्ति, सांकेतिक अभिव्यक्ति, लिखित अभिव्यक्ति शामिल हैं। भाषायी योग्यता एक कौशल है, जिसे अर्जित किया जाता है।

इस कौशल को अर्जित करने की प्रक्रिया बालक के जन्म के साथ ही

प्रारम्भ हो जाती है। अनुकरण, वातावरण के साथ अनुक्रिया तथा शारीरिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति की माँग इसमें विशेष भूमिका निभाती है। यह विकास बालक में धीरे-धीरे एक निश्चित क्रम में होता है।

जन्म से लेकर आठ माह तक बालक को किसी शब्द की जानकारी नहीं होती। 9 माह से 12 माह के बीच वह तीन या चार शब्दों को समझने लगता है। डेढ़ वर्ष के भीतर उसे 10 से 12 शब्दों की जानकारी हो जाती है।

2 वर्ष की आयु तक उसे दो सौ से अधिक शब्दों की जानकारी हो जाती है। 3 वर्ष के भीतर ही बालक लगभग एक हजार शब्दों को समझने लगता है। इसी तरह उसमें भाषायी विकास होते रहते हैं और 16 वर्ष की आयु तक बालक लगभग एक लाख शब्दों को समझने की योग्यता विकसित कर लेता है।

भाषायी विकास की प्रक्रिया में लिखने एवं पढ़ने का भी ज्ञान बच्चे में धीरे-धीरे ही होता है। बाल्यावस्था में वह धीरे-धीरे एक-एक शब्द को पढ़ता एवं लिखता है, उसके बाद उसके इन कौशलों में गति आती जाती है।

शिक्षकों को भाषा के विकास की प्रक्रिया का सही ज्ञान होना इसलिए अनिवार्य है, क्योंकि इसी के आधार पर बालक की भाषा से सम्बन्धित समस्याएँ; जैसे- अस्पष्ट उच्चारण, गलत उच्चारण, तुतलाना, हकलाना, तीव्र अस्पष्टः वाणी आदि का समाधान कर सकता है।

सामाजिक विकास

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। बालक में सामाजिक भावनाओं का विकास जन्म के बाद ही शुरू होता है। वृद्धि एवं विकास के अन्य पहलुओं की तरह ही सामाजिक गुण भी बच्चे में धीरे-धीरे पनपते हैं।

इन गुणों के विकास की प्रक्रिया, जो बच्चे के सामाजिक व्यवहार में वांछनीय परिवर्तन लाने का कार्य सम्पन्न करती है, सामाजिक विकास अथवा समाजीकरण के नाम से जानी जाती है।

सामाजिक वृद्धि एवं विकास का अर्थ होता है, अपने साथ एवं दूसरों के साथ भली-भाँति समायोजन करने की योग्यता। सामाजिक विकास की प्रक्रिया व्यक्ति को सामाजिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और परम्पराओं के अनुकूल आचरण करने में पूरी-पूरी सहायता करती है और इस तरह से अपने सामाजिक परिवेश में ठीक प्रकार से समायोजित होने में समर्थ बनाती है।

शारीरिक ढाँचा, स्वास्थ्य, बुद्धि, संवेगात्मक विकास, परिवार, पारिवारिक वातावरण, सामाजिक वातावरण, इत्यादि व्यक्ति के सामाजिक विकास को प्रभावित करते हैं। शिक्षा के कई उद्देश्यों में एक बालक का सामाजिक विकास भी होता है।

सांवेगिक/संवेगात्मक विकास

संवेग जिसे भाव भी कहा जाता है का अर्थ होता है, ऐसी अवस्था जो व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है। भय, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, स्नेह, विषाद, आदि संवेग के उदाहरण हैं। बालक में आयु बढ़ने के साथ ही इन संवेगों का विकास भी होता रहता है।

संवेगात्मक विकास मानव वृद्धि एवं विकास का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। व्यक्ति का संवेगात्मक व्यवहार उसके शारीरिक वृद्धि एवं विकास को ही

प्रभावित नहीं करता, बल्कि बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास को भी प्रभावित करता है। प्रत्येक संवेगात्मक अनुभूति व्यक्ति में कई प्रकार के शारीरिक और शरीर सम्बन्धी परिवर्तनों को जन्म देती है।

5,विद्यालय के परिवेश और क्रिया-कलापों को उचित प्रकार से संगठित कर अध्यापक बच्चों के संवेगात्मक विकास में भरपूर योगदान दे सकते हैं।

बालकों को शिक्षकों का पर्याप्त सहयोग एवं स्नेह मिलना उनके व्यक्तित्व के विकास के दृष्टिकोण से आवश्यक है। इसी प्रकार यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि बालक के स्वाभिमान को कभी ठेस न पहुँचे। इस तरह संवेगात्मक विकास के कई पहलुओं को ध्यान में रखकर ही बालक का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है।

1.6 सृजनात्मकता

सृजनात्मकता मौलिक चिन्तन, नए प्रकार के संगठन, अलग प्रकार का चिन्तन एवं व्यवहार, पुरानी समस्याओं के नवीन समाधानों, नए सम्बन्धों को देखना अथवा व्याख्या, लोचशीलता तथा जीवन के भिन्न क्षेत्रों में नवीन दृष्टिकोण अपनाना है। सृजनकर्ता के लिए कोई भी मौलिक विचार अथवा व्याख्या सृजनात्मकता का उदाहरण है। इस प्रकार सृजनात्मकता चिन्तन, सामाजिक अन्तःक्रिया की विधियों अथवा अध्ययन, कार्य अथवा खेल में सम्भव है। जेम्स ड्रेवर के अनुसार, "अनिवार्य रूप से किसी नई वस्तु का सृजन करना ही सृजनात्मकता है।" मनोविश्लेषणात्मक, साहचर्यवाद, अन्तः दृष्टिवाद एवं अस्तित्ववाद सिद्धान्तों का सम्बन्ध सृजनात्मकता से है।

गिलफोर्ड के अनुसार सृजनात्मकता

गिलफोर्ड ने सृजनात्मकता के निम्नलिखित तत्त्व बताए हैं

तात्कालिक स्थिति से परे जाने की योग्यता जो व्यक्ति वर्तमान परिस्थितियों से हटकर, उससे आगे की सोचता है और अपने चिन्तन को मूर्त रूप देता है, उसमें सृजनात्मकता का गुण पाया जाता है।

समस्या की पुनर्व्याख्या सृजनात्मकता का एक तत्त्व समस्या की पुनर्व्याख्या है।

सामंजस्य जो बालक तथा व्यक्ति असामान्य, किन्तु प्रासंगिक विचार तथा तथ्यों के साथ समन्वय स्थापित करते हैं, वे सृजनात्मक कहलाते हैं।

अन्य के विचारों में परिवर्तन ऐसे व्यक्तियों में भी सृजनात्मकता विद्यमान रहती है, जो तर्क, चिन्तन तथा प्रमाण द्वारा दूसरे व्यक्तियों के विचारों में परिवर्तन कर देते हैं।

सृजनात्मक क्षमता का विकास

शिक्षक को बालकों में सृजनात्मक क्षमता का विकास करने के लिए निम्नलिखित प्रमुख तरीके अपनाने चाहिए

1. तथ्यों का अधिगम समस्या को हल करने में कौन-कौन-से तथ्यों को सिखाया जाए, शिक्षक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए।

2. मौलिकता शिक्षक को चाहिए कि वह तथ्यों के आधार पर मौलिकता (Fundamentality) के दर्शन कराए।

3. मूल्यांकन बालकों में अपना मूल्यांकन स्वयं करने की प्रवृत्ति का विकास करना चाहिए।

4. समस्या के स्तरों की पहचान समस्या के स्तरों को पहचानकर उसे दूर करना चाहिए।

5. जाँच बालकों में जाँच (Testing) करने की कुशलता का अर्जन कराया जाए। 6. पाठ्य सहगामी क्रियाएँ विद्यालय में बुलेटिन बोर्ड, मैग्जीन,पुस्तकालय, वाद-विवाद, खेल-कूद, स्काउटिंग, एनसीसी आदि क्रियाओं द्वारा नवीन उ‌द्भावनाओं का विकास करना चाहिए।

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