स्टॉफ सिलेक्शन कमीशन(SSC)में कुल15,130 पदों पर भर्ती, 9 मार्च को खुलेंगे ऑप्शन कम प्रेफरेंस विंडो

स्टॉफ सिलेक्शन कमीशन ने कुल15,130 पदों पर भर्ती के लिए वैकेंसी चार्ट जारी कर दी हैl

जो भी उम्मीदवार लंबे समय से सरकारी नौकरी की तलाश में जुटे हुए हैं, उनके लिए स्टॉफ सिलेक्शन कमीशन (SSC) ने कंबाइंड ग्रेजुएशट लेवल एग्जामिनेशन के लिए लास्ट वैकेंसी चार्ट जारी कर दिया है. जारी हुए आंकड़ों के अनुासर, कुल 15 हजार से अधिक पदों पर भर्ती की जाएगीl


 बता दें कि यह भर्ती केंद्र सरकार के अलग-अलग मंत्रालयों, विभागों और सरकारी संगठनों में की जाएगी. 

हर साल बड़ी संख्या में होती है भर्ती 

CGL परीक्षा के जरिए हर साल बड़ी संख्या में ग्रेजुएट लेवल के उम्मीदवारों को नौकरी मिलती है. जारी हुए नोटिस में आयोग ने यह भी साफ कर दिया है कि उम्मीदवारों को अपनी पसंद की सीट चुनने के लिए ऑप्शन कम प्रेफरेंस विंडो को मार्च में ओपन किया जाएगा. इसके साथ ही उम्मीदवारों को किसी तरह की दुविधा का सामना न करने पड़े इसके लिए आयोग ने ऑफिशियल वेबसाइट पर सैंपल ऑप्शन फॉर्म भी जारी किया हैl  

जारी हुई लास्ट वैकेंसी चार्ट के मुताबिक, कुल 15, 130 पदों पर उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा. चयनित उम्मीदवारों को सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और संगठनों में काम करने का मौका मिलेगा. 

कैटेगरी के मुताबिक पदों का बंटवारा 

आयोग की ओर से जारी आंकड़ों में सभी वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण के मुताबिक पद निर्धारित किया गया है. इनमें अनारक्षित (UR) 6,464 पद, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) 3,834 पद, अनुसूचित जाति (SC)  2,223 पद, अनुसूचित जनजाति (ST)  1,134 पद और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) 1,475 पद शामिल हैं.

9 मार्च को खुलेंगे ऑप्शन कम प्रेफरेंस विंडो 

बता दें कि आयोग ने बताया है कि विभिन्न पदों के लिए उम्मीदवारों को अपनी पहली पसंद भरनी होगी जिसके लिए ऑप्शन कम प्रेफरेंस विंडो 9 मार्च को खुलेंगेl

 अभ्यर्थियों को ऑनलाइन लॉगिन कर बताना होगा कि वे किन-किन पदों को प्राथमिकता देना चाहते हैं. इसके आधार पर ही अंतिम चरण और पदों का आवंटन आगे बढ़ेगा. 

बाल विकास और शिक्षाशास्त्र (Child Development and Pedagogy) की तैयारी कैसे करें?

UPTET,CTET और अन्य TET परीक्षाओं के लिए बाल विकास और शिक्षाशास्त्र (CDP) की तैयारी के लिए सबसे पहले 1-5 और 6-8 कक्षा के सिलेबस को समझें। पियाजेकोहलबर्गऔर वायगोत्स्की के सिद्धांतोंसमावेशी शिक्षाऔर मूल्यांकन लागू पर विशेष ध्यान दें। पिछले वर्षों के पेपर हल करें, NCERT की पुस्तकें पढ़ें और वैचारिक समझ (Conceptual Clarity) पर ध्यान केंद्रित करें।


CDP (Child Development and Pedagogy) की तैयारी के लिए मुख्य चरण:

सिलेबस को समझें (Syllabus को समझें): बाल विकास के सिद्धांतअनुवांशिकता-पर्यावरणसामाजिकरणऔर पियाजे-कोहलबर्ग-वायगोत्स्की जैसे प्रमुख सिद्धांतों को विस्तार से पढ़ें।

महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान दें:समावेशी शिक्षाबाल-संगठनशिक्षाप्रगतिशील शिक्षाऔर मूल्यांकन-आकलन (Assessment) बहुत महत्वपूर्ण हैं।

NCERT Books पढ़ें: कक्षा 1 से 8 तक की NCERT Books (नैदानिक ​​मनोविज्ञान और शिक्षण से संबंधित) बाल विकास की नींव मजबूत करती हैं।

पिछले वर्षों के प्रश्न पत्र (PYQs) हल करें: पिछले 5-10 वर्षों के CTET/TET प्रश्न पत्र हल करना सबसे प्रभावी तरीका है। इससे प्रश्न का नतीजा समझ में आता है।

मॉक टेस्ट और रिवीजन (मॉक टेस्ट और रिवीजन): ऑनलाइन या ऑफलाइन मॉक टेस्ट दें ताकि समय प्रबंधन (टाइम मैनेजमेंट) बेहतर हो सके।

शिक्षण लागू (पेडागॉजी) पर ध्यान दें: बाल-आश्रित शिक्षा के अनुसारटने के बजाय समझने और जिज्ञासा को प्रोत्साहित करने वाले उत्तरों पर जोर दें।  महत्वपूर्ण विषय (Topics):

विकास के चरण और उनके सिद्धांत (संज्ञानात्मक, सामाजिक, भावनात्मक)

भाषा और विचार (भाषा और विचार)

बुद्धिमत्ता (बुद्धिमत्ता - गार्डनर, स्टर्नबर्ग)

लिंग एक सामाजिक संरचना (लिंग एक सामाजिक निर्माण के रूप में)

एनसीएफ-2005 (NCF-2005) और एनईपी-2020 (NEP-2020)

साधन:

किताबें: अरिहंत (अरिहंत) या दिशा प्रकाशन की बाल विकास और शिक्षाशास्त्र की किताबें।

YouTube पर CTET के लिए कई चैनल जो CDP के थ्योरी वीडियो देते हैं।

वेबसाइटें: www.mybasiceducator.com 

अध्याय 1;- बाल विकास : अर्थ, आवश्यकता, क्षेत्र एवं अवस्थाएँ Child Development : Meaning, Necessity, Domain and Stages

  1 बाल विकास का अर्थ

बाल विकास का सामान्य अर्थ होता है- बालकों का मानसिक व शारीरिक विकास अर्थात् बालकों का सर्वांगीण विकास। बाल विकास शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संज्ञानात्मक, भाषायी तथा धार्मिक आदि रूपों में होता है। बाल विकास का सम्बन्ध गुणात्मक (कार्य कुशलता, ज्ञान, तर्क, नवीन विचारधारा) एवं परिमाणात्मक (लम्बाई में वृद्धि, भार में वृद्धि तथा अन्य) दोनों से है।

बाल विकास के अन्तर्गत शिक्षकों को एक निश्चित आयु के सामान्य बालकों को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक परिपक्वता का ज्ञान होना आवश्यक है, जिससे वे उनकी क्रियाओं को नियन्त्रित करके अपेक्षित दिशा प्रदान कर सकें।


रिक के अनुसार, "विकास एक क्रमिक एवं मन्दगति से चलने वाली प्रक्रिया है।"

क्रो एण्ड क्रो के अनुसार, "बाल विकास वह विज्ञान है, जो बालक के व्यवहार का अध्ययन गर्भावस्था से मृत्यु पर्यन्त तक करता है।"

हरलॉक के अनुसार, "बाल विकास मनोविज्ञान की वह शाखा है, जो गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक होने वाले मनुष्य के विकास के विभिन्न अवस्थाओं में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करती है।"

2 बाल विकास की आवश्यकता

आधुनिक युग में बाल विकास का अध्ययन कई रूप से महत्त्वपूर्ण है। इस दिशा में हुए अध्ययनों से न केवल बालकों का ही कल्याण हुआ है, बल्कि माता-पिता को बालकों को समझने में बहुत सुविधा भी मिली है तथा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मानव समाज का कल्याण हुआ है। मनोविज्ञान की शाखा बाल विकास के अध्ययन से बालकों के जीवन को सुखी ही नहीं बनाया जा सकता है, बल्कि उनके व्यवहार को प्रशंसनीय और उनके जीवन को समृद्धिशाली भी बनाया जा सकता है। इस विषय के अध्ययन की आवश्यकता शिक्षक, बाल चिकित्सक, बाल सुधारक आदि सभी को होती है। इस विषय की आवश्यकता निम्न रूप से समाज में हो सकती है

बालकों के स्वभाव को समझने में उपयोगी

बालकों के शिक्षण एवं शिक्षा में उपयोगी

बालकों के विकास को समझने में सहायक

बालकों के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने में सहायक

बालकों के व्यक्तित्व विकास को समझने में उपयोगी

बालकों के व्यवहार के नियन्त्रण में सहायक

बाल निर्देशन में सहायक

बाल व्यवहार के सम्बन्ध में पूर्वकथन करने में सहायक

सुखी पारिवारिक जीवन बनाने में सहायक।

.3 बाल विकास के क्षेत्र

बाल विकास का क्षेत्र अत्यन्त ही विस्तृत एवं व्यापक है। यह बालक के विकास के सभी आयाम, स्वरूप, असामान्यताओं, शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तनों तथा उनको प्रभावित करने वाले सभी तत्त्वों का अध्ययन करता है। बाल विकास के विषय क्षेत्र के अन्तर्गत निम्न क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है

बाल विकास की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन

बाल विकास के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन

बाल विकास को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का अध्ययन

बालकों की विभिन्न असामान्यताओं का अध्ययन

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अध्ययन

बाल व्यवहारों और अन्तः क्रियाओं का अध्ययन

बालकों की रुचियों का अध्ययन

बालकों की विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन

बालकों की वैयक्तिक भिन्नताओं का अध्ययन

बालकों के व्यक्तित्व का मूल्यांकन

बालक-अभिभावक सम्बन्धों का अध्ययन आदि।

4 बाल विकास की अवस्थाएँ

मानव विकास एक सतत् प्रक्रिया है। शारीरिक विकास तो एक सीमा (परिपक्वता प्राप्त करने) के बाद रुक जाता है, किन्तु मनोशारीरिक क्रियाओं में विकास निरन्तर होता रहता है। इन मनोशारीरिक क्रियाओं के अन्तर्गत मानसिक, भाषायी, संवेगात्मक, सामाजिक एवं चारित्रिक विकास आते हैं। इनका विकास विभिन्न आयु स्तरों में भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है। इन आयु स्तरों को मानव विकास की अवस्थाएँ कहते हैं।

भारतीय मनीषियों ने मानव विकास की अवस्थाओं को सात कालों में विभाजित किया है

1. गर्भावस्था

गर्भाधान से जन्म तक

2. शैशवावस्था

जन्म से 5 वर्ष तक

3. बाल्यावस्था

5 वर्ष से 12 वर्ष तक

4. किशोरावस्था

12 वर्ष से 18 वर्ष तक

5. युवावस्था

18 वर्ष से 26 वर्ष तक)

6. प्रौढ़ावस्था

25 वर्ष से 55 वर्ष तक

7. वृद्धावस्था

55 वर्ष से मृत्यु तक

इस समय अधिकतर विद्वान् मानव अवस्थाओं के अन्तर्गत करते हैं विकास का अध्ययन निम्नलिखित चार अवस्थाओं में होने वाले मानव विकास का अध्ययन किया जाता है।

1. शैशवावस्था

जन्म से 6 वर्ष तक

2. बाल्यावस्था

6 वर्ष से 12 वर्ष तक

3. किशोरावस्था

12 वर्ष से 18 वर्ष तक

4. वयस्कावस्था

18 वर्ष से मृत्यु तक

शिक्षा की दृष्टि से प्रथम तीन अवस्थाएँ महत्त्वपूर्ण हैं, इसलिए बाल विकास में इन्हीं तीन अवस्थाओं में होने वाले मानव विकास का अध्ययन किया जाता है।

शैशवावस्था

जन्म से 6 वर्ष तक की अवस्था को शैशवावस्था कहा जाता है। इसमें जन्म से 3 वर्ष तक बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास तेजी से होता है। शैशवावस्था में अनुकरण एवं दोहराने की तीव्र प्रवृत्ति बच्चों में पाई जाती है। इसी काल में बच्चों का समाजीकरण भी प्रारम्भ हो जाता है। इस काल में जिज्ञासा की तीव्र प्रवृत्ति बच्चों में पाई जाती है। मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से यह काल भाषा सीखने की सवर्वोत्तम अवस्था है। इन्हीं सब कारणों से यह काल शिक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

बाल्यावस्था

6 वर्ष से 12 वर्ष तक की अवस्था को बाल्यावस्था कहा जाता है। बाल्यावस्था के प्रथम चरण 6 से 9 वर्ष में बालकों की लम्बाई एवं भार दोनों बढ़ते हैं। इस काल में बच्चों में चिन्तन एवं तर्क शक्तियों का विकास हो जाता है। इस काल के बाद से बच्चे पढ़ाई में रुचि लेने लगते हैं। शैशवावस्था में बच्चे जहाँ बहुत तीव्र गति से सीखते हैं, वहीं बाल्यावस्था में सीखने की गति मन्द हो जाती है, किन्तु उनके सीखने का क्षेत्र शैशवावस्था की तुलना में विस्तृत हो जाता है। मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से इस अवस्था में बच्चों की शिक्षा के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग करना चाहिए।

किशोरावस्था

12 वर्ष से 18 वर्ष तक की अवस्था को किशोरावस्था कहा जाता है। यह वह समय होता है, जिसमें व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर उन्मुख होता है। इस अवस्था में किशोरों की लम्बाई एवं भार दोनों में वृद्धि होती है, साथ ही मांसपेशियों में भी वृद्धि होती है। 12-14 वर्ष की आयु के बीच लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की लम्बाई एवं मांसपेशियों में तेजी से वृद्धि होती है एवं 14-18 वर्ष की आयु के बीच लड़कियों की अपेक्षा लड़कों की लम्बाई एवं मांसपेशियाँ तेजी से बढ़ती हैं। इस काल में प्रजनन अंग विकसित होने लगते हैं एवं उनकी काम की मूल प्रवृत्ति जागृत होती है। इस अवस्था में किशोर-किशोरियों की बुद्धि का पूर्ण विकास हो जाता है, उनके ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता बढ़ जाती है, स्मरण शक्ति बढ़ जाती है एवं उनमें स्थायित्व आने लगता है। इस अवस्था में मित्र बनाने की प्रवृत्ति तीव्र होती है एवं मित्रता में प्रगाढ़ता भी इस दौरान सामान्य-सी बात है।

5 विकास के विभिन्न आयाम

बाल विकास को वैसे तो कई आयामों में विभाजित किया जा सकता है, किन्तु बाल विकास एवं बाल-मनोविज्ञान के अध्ययन के दृष्टिकोण से 

निम्नलिखित आयाम महत्त्वपूर्ण हैं

शारीरिक विकास

इसके अन्तर्गत बालक के शरीर के बाह्य एवं आन्तरिक अवयवों का विकास शामिल है। शरीर के बाह्य परिवर्तन; जैसे-ऊँचाई, शारीरिक अनुपात में वृद्धि इत्यादि स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। आन्तरिक अवयवों के परिवर्तन बाह्य रूप से दिखाई तो नहीं पड़ते, किन्तु शरीर के भीतर इनक समुचित विकास होता रहता है।

शारीरिक वृद्धि एवं विकास की प्रक्रिया व्यक्तित्व के उचित समायोजन और विकास के मार्ग में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रारम्भ में शिशु अपने हर प्रकार के कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है, धीरे-धीरे विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम होता जाता है।

शारीरिक वृद्धि एवं विकास पर बालक के आनुवंशिक गुणों का प्रभाव देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त बालक के परिवेश एवं उसकी देखभाल का भी शारीरिक वृद्धि एवं विकास पर प्रभाव पड़ता है।

मानसिक विकास

मानसिक विकास से तात्पर्य बालक की उन सभी मानसिक योग्यताओं एवं क्षमताओं में वृद्धि और विकास से है, जिसके परिणामस्वरूप वह अपने निरन्तर बदलते हुए वातावरण में ठीक प्रकार समायोजन करता है और विभिन्न प्रकार की समस्याओं को सुलझाने में अपनी मानसिक शक्तियों का पर्याप्त उपयोग कर पाता है।

कल्पना करना, स्मरण करना, विचार करना, निरीक्षण करना, समस्या समाधान करना, निर्णय लेना, इत्यादि की योग्यता संज्ञानात्मक विकास के फलस्वरूप ही विकसित होते हैं। जन्म के समय बालक में इस प्रकार की योग्यता का अभाव होता है, धीरे-धीरे आयु बढ़ने के साथ-साथ उसमें मानसिक विकास की गति भी बढ़ती रहती है।

संज्ञानात्मक विकास

शिक्षकों को संज्ञानात्मक विकास की पर्याप्त जानकारी इसलिए होनी चाहिए, क्योंकि इसके अभाव में वह बालकों की इससे सम्बन्धित समस्याओं का समाधान नहीं कर पाएगा। यदि कोई बालक मानसिक रूप से कमजोर है, तो इसके क्या कारण हैं, यह जानना उसके उपचार के लिए आवश्यक है।

संज्ञानात्मक विकास के बारे में पर्याप्त जानकारी होने से विभिन्न आयु स्तरों पर पाठ्यक्रम, सहगामी क्रियाओं तथा अनुभवों के चयन और नियोजन में सहायता मिलती है। किस विधि और तरीके से पढ़ाया जाए, सहायक सामग्री तथा शिक्षण साधन का प्रयोग किस तरह किया जाए, शैक्षणिक वातावरण किस प्रकार का हो, इन सबके निर्धारण में संज्ञानात्मक विकास के विभिन्न पहलुओं की जानकारी शिक्षकों के लिए सहायक साबित होती है।

भाषायी विकास

भाषा का विकास एक प्रकार का संज्ञानात्मक विकास ही है। मानसिक योग्यता की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। भाषा का तात्पर्य होता है वह सांकेतिक साधन, जिसके माध्यम से बालक अपने विचारों एवं भावों का सम्प्रेषण करता है तथा दूसरों के विचारों एवं भावों को समझता है।

अभिव्यक्ति क्षमता का विकास

भाषायी योग्यता के अन्तर्गत मौखिक अभिव्यक्ति, सांकेतिक अभिव्यक्ति, लिखित अभिव्यक्ति शामिल हैं। भाषायी योग्यता एक कौशल है, जिसे अर्जित किया जाता है।

इस कौशल को अर्जित करने की प्रक्रिया बालक के जन्म के साथ ही

प्रारम्भ हो जाती है। अनुकरण, वातावरण के साथ अनुक्रिया तथा शारीरिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति की माँग इसमें विशेष भूमिका निभाती है। यह विकास बालक में धीरे-धीरे एक निश्चित क्रम में होता है।

जन्म से लेकर आठ माह तक बालक को किसी शब्द की जानकारी नहीं होती। 9 माह से 12 माह के बीच वह तीन या चार शब्दों को समझने लगता है। डेढ़ वर्ष के भीतर उसे 10 से 12 शब्दों की जानकारी हो जाती है।

2 वर्ष की आयु तक उसे दो सौ से अधिक शब्दों की जानकारी हो जाती है। 3 वर्ष के भीतर ही बालक लगभग एक हजार शब्दों को समझने लगता है। इसी तरह उसमें भाषायी विकास होते रहते हैं और 16 वर्ष की आयु तक बालक लगभग एक लाख शब्दों को समझने की योग्यता विकसित कर लेता है।

भाषायी विकास की प्रक्रिया में लिखने एवं पढ़ने का भी ज्ञान बच्चे में धीरे-धीरे ही होता है। बाल्यावस्था में वह धीरे-धीरे एक-एक शब्द को पढ़ता एवं लिखता है, उसके बाद उसके इन कौशलों में गति आती जाती है।

शिक्षकों को भाषा के विकास की प्रक्रिया का सही ज्ञान होना इसलिए अनिवार्य है, क्योंकि इसी के आधार पर बालक की भाषा से सम्बन्धित समस्याएँ; जैसे- अस्पष्ट उच्चारण, गलत उच्चारण, तुतलाना, हकलाना, तीव्र अस्पष्टः वाणी आदि का समाधान कर सकता है।

सामाजिक विकास

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। बालक में सामाजिक भावनाओं का विकास जन्म के बाद ही शुरू होता है। वृद्धि एवं विकास के अन्य पहलुओं की तरह ही सामाजिक गुण भी बच्चे में धीरे-धीरे पनपते हैं।

इन गुणों के विकास की प्रक्रिया, जो बच्चे के सामाजिक व्यवहार में वांछनीय परिवर्तन लाने का कार्य सम्पन्न करती है, सामाजिक विकास अथवा समाजीकरण के नाम से जानी जाती है।

सामाजिक वृद्धि एवं विकास का अर्थ होता है, अपने साथ एवं दूसरों के साथ भली-भाँति समायोजन करने की योग्यता। सामाजिक विकास की प्रक्रिया व्यक्ति को सामाजिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और परम्पराओं के अनुकूल आचरण करने में पूरी-पूरी सहायता करती है और इस तरह से अपने सामाजिक परिवेश में ठीक प्रकार से समायोजित होने में समर्थ बनाती है।

शारीरिक ढाँचा, स्वास्थ्य, बुद्धि, संवेगात्मक विकास, परिवार, पारिवारिक वातावरण, सामाजिक वातावरण, इत्यादि व्यक्ति के सामाजिक विकास को प्रभावित करते हैं। शिक्षा के कई उद्देश्यों में एक बालक का सामाजिक विकास भी होता है।

सांवेगिक/संवेगात्मक विकास

संवेग जिसे भाव भी कहा जाता है का अर्थ होता है, ऐसी अवस्था जो व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है। भय, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, स्नेह, विषाद, आदि संवेग के उदाहरण हैं। बालक में आयु बढ़ने के साथ ही इन संवेगों का विकास भी होता रहता है।

संवेगात्मक विकास मानव वृद्धि एवं विकास का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। व्यक्ति का संवेगात्मक व्यवहार उसके शारीरिक वृद्धि एवं विकास को ही

प्रभावित नहीं करता, बल्कि बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास को भी प्रभावित करता है। प्रत्येक संवेगात्मक अनुभूति व्यक्ति में कई प्रकार के शारीरिक और शरीर सम्बन्धी परिवर्तनों को जन्म देती है।

5,विद्यालय के परिवेश और क्रिया-कलापों को उचित प्रकार से संगठित कर अध्यापक बच्चों के संवेगात्मक विकास में भरपूर योगदान दे सकते हैं।

बालकों को शिक्षकों का पर्याप्त सहयोग एवं स्नेह मिलना उनके व्यक्तित्व के विकास के दृष्टिकोण से आवश्यक है। इसी प्रकार यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि बालक के स्वाभिमान को कभी ठेस न पहुँचे। इस तरह संवेगात्मक विकास के कई पहलुओं को ध्यान में रखकर ही बालक का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है।

1.6 सृजनात्मकता

सृजनात्मकता मौलिक चिन्तन, नए प्रकार के संगठन, अलग प्रकार का चिन्तन एवं व्यवहार, पुरानी समस्याओं के नवीन समाधानों, नए सम्बन्धों को देखना अथवा व्याख्या, लोचशीलता तथा जीवन के भिन्न क्षेत्रों में नवीन दृष्टिकोण अपनाना है। सृजनकर्ता के लिए कोई भी मौलिक विचार अथवा व्याख्या सृजनात्मकता का उदाहरण है। इस प्रकार सृजनात्मकता चिन्तन, सामाजिक अन्तःक्रिया की विधियों अथवा अध्ययन, कार्य अथवा खेल में सम्भव है। जेम्स ड्रेवर के अनुसार, "अनिवार्य रूप से किसी नई वस्तु का सृजन करना ही सृजनात्मकता है।" मनोविश्लेषणात्मक, साहचर्यवाद, अन्तः दृष्टिवाद एवं अस्तित्ववाद सिद्धान्तों का सम्बन्ध सृजनात्मकता से है।

गिलफोर्ड के अनुसार सृजनात्मकता

गिलफोर्ड ने सृजनात्मकता के निम्नलिखित तत्त्व बताए हैं

तात्कालिक स्थिति से परे जाने की योग्यता जो व्यक्ति वर्तमान परिस्थितियों से हटकर, उससे आगे की सोचता है और अपने चिन्तन को मूर्त रूप देता है, उसमें सृजनात्मकता का गुण पाया जाता है।

समस्या की पुनर्व्याख्या सृजनात्मकता का एक तत्त्व समस्या की पुनर्व्याख्या है।

सामंजस्य जो बालक तथा व्यक्ति असामान्य, किन्तु प्रासंगिक विचार तथा तथ्यों के साथ समन्वय स्थापित करते हैं, वे सृजनात्मक कहलाते हैं।

अन्य के विचारों में परिवर्तन ऐसे व्यक्तियों में भी सृजनात्मकता विद्यमान रहती है, जो तर्क, चिन्तन तथा प्रमाण द्वारा दूसरे व्यक्तियों के विचारों में परिवर्तन कर देते हैं।

सृजनात्मक क्षमता का विकास

शिक्षक को बालकों में सृजनात्मक क्षमता का विकास करने के लिए निम्नलिखित प्रमुख तरीके अपनाने चाहिए

1. तथ्यों का अधिगम समस्या को हल करने में कौन-कौन-से तथ्यों को सिखाया जाए, शिक्षक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए।

2. मौलिकता शिक्षक को चाहिए कि वह तथ्यों के आधार पर मौलिकता (Fundamentality) के दर्शन कराए।

3. मूल्यांकन बालकों में अपना मूल्यांकन स्वयं करने की प्रवृत्ति का विकास करना चाहिए।

4. समस्या के स्तरों की पहचान समस्या के स्तरों को पहचानकर उसे दूर करना चाहिए।

5. जाँच बालकों में जाँच (Testing) करने की कुशलता का अर्जन कराया जाए। 6. पाठ्य सहगामी क्रियाएँ विद्यालय में बुलेटिन बोर्ड, मैग्जीन,पुस्तकालय, वाद-विवाद, खेल-कूद, स्काउटिंग, एनसीसी आदि क्रियाओं द्वारा नवीन उ‌द्भावनाओं का विकास करना चाहिए।

B.ED D.EL.ED New Rule : बीएड और डीएलएड हेतु नया नियम हुआ जारी

राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) ने 2025 के लिए बीएड (B.Ed) और डीएलएड (D.El.Ed) कोर्स के लिए नए नियम जारी कर दिए हैं। यह बदलाव नई शिक्षा नीति के तहत शिक्षक प्रशिक्षण की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के उद्देश्य से किए गए हैं।


 अब छात्र एक समय में केवल एक ही शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स कर सकेंगे। इसके साथ ही 6 महीने की अनिवार्य इंटर्नशिप और मान्यता प्राप्त संस्थानों से प्रशिक्षण लेने का प्रावधान भी लागू किया गया है।

बीएड और डीएलएड कोर्स के नियमों में बड़ा बदलाव

NCTE ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षक बनने के इच्छुक छात्र अब एक साथ बीएड और डीएलएड दोनों कोर्स नहीं कर पाएंगे। पहले कई विद्यार्थी दोनों को एक साथ पूरा करने की कोशिश करते थे ताकि समय की बचत हो सके, लेकिन इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न उठने लगे थे। इसलिए अब प्रत्येक छात्र को केवल एक ही कोर्स चुनना होगा और उसी पर फोकस करना होगा।

6 महीने की अनिवार्य इंटर्नशिप का प्रावधान

नए नियमों के अनुसार, बीएड और डीएलएड दोनों कोर्स में अब 6 महीने की अनिवार्य इंटर्नशिप करना जरूरी होगा। यह इंटर्नशिप केवल उन्हीं स्कूलों में की जा सकेगी जो NCTE से मान्यता प्राप्त हैं। इस बदलाव का उद्देश्य छात्रों को शिक्षक बनने से पहले वास्तविक कक्षा अनुभव प्रदान करना है ताकि वे प्रशिक्षण के दौरान व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर सकें।

केवल मान्यता प्राप्त संस्थानों से की गई पढ़ाई ही वैध मानी जाएगी

NCTE ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल उन्हीं संस्थानों से की गई पढ़ाई को मान्यता दी जाएगी जिन्हें परिषद ने मान्यता दी है। किसी फर्जी या गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान से किया गया कोर्स वैध नहीं माना जाएगा। ऐसे संस्थानों से डिग्री लेने वाले छात्रों की डिग्री निरस्त मानी जाएगी।

ऑनलाइन पढ़ाई को लेकर भी लागू हुए नए दिशा निर्देश

नए नियमों के अनुसार, अब पूरा बीएड या डीएलएड कोर्स ऑनलाइन नहीं किया जा सकेगा। केवल थ्योरी से संबंधित कुछ मॉड्यूल ही ऑनलाइन संचालित किए जाएंगे। प्रैक्टिकल और प्रशिक्षण के लिए छात्रों को संस्थान में उपस्थित होना अनिवार्य होगा। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि छात्र केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं बल्कि व्यवहारिक शिक्षण कौशल भी प्राप्त करें।

प्रवेश से पहले संस्थान की मान्यता जांचना जरूरी

छात्रों को अब किसी भी संस्थान में दाखिला लेने से पहले उसकी मान्यता स्थिति अवश्य जांचनी होगी। इसके साथ ही संस्थान की फीस संरचना, इंटर्नशिप व्यवस्था और NCTE से अनुमोदन की जानकारी भी देखना आवश्यक है। ऐसा न करने पर भविष्य में डिग्री या प्रमाणपत्र अमान्य हो सकता है।

शिक्षकों की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में बड़ा कदम

एनसीटीई के इन नए दिशा निर्देशों को शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा सुधार माना जा रहा है। पहले जहां कई छात्र दोहरी डिग्री लेकर शिक्षक बनने की प्रक्रिया को मात्र औपचारिकता मानते थे, वहीं अब उन्हें अपने चुने हुए कोर्स में पूरी लगन से जुड़ना होगा। यह बदलाव भविष्य में स्कूलों और कॉलेजों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों की संख्या बढ़ाने में मदद करेगा।

छात्रों को मिलेगा बेहतर प्रशिक्षण अनुभव

नई व्यवस्था के तहत छात्रों को अधिक व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होगा। इंटर्नशिप के दौरान वे शिक्षण की वास्तविक परिस्थितियों में काम करेंगे, जिससे उनके अंदर आत्मविश्वास और शिक्षण कौशल में सुधार आएगा। इस कदम से शिक्षा प्रणाली को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की दिशा में एक ठोस पहल मानी जा रही है।

उत्तर प्रदेश में प्री प्राइमरी टीचर्स में एजुकेटर रिटेन की नई विज्ञप्ति, सुनहरा मौका

यूपी प्री प्राइमरी एजुकेटर न्यूज़: उत्तर प्रदेश के प्री-प्राइमरी स्कूल में एजुकेटर से जुड़ी नई अधिसूचना जारी की गई है।  सी. शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश की ओर से मिली जानकारी के अनुसार राज्य के सभी छात्रावासों में आंगनवाड़ी ईसीसीई एजुकेटर शामिल होंगे। 


 जो भी सुपरमार्केट सुपरमार्केट बाल वाटिका स्कॉटिश में एजुकेटर बनने की चाहत रखते हैं, उनके लिए यह अहम खबर है।  आइए जानते हैं पूरी डिटेल।

यूपी के प्री-प्राइमरी स्कॉटलैंड में एजुकेटर होगेस्ट

व्यावसायिक शिक्षा विभाग ने बालवाड़ी आश्रम के बच्चों को नामांकित करने के उद्देश्य से एजुकेटर की नियुक्ति का निर्णय लिया है।  यह सभी सामान में की जाएगी।  शुरुआती चरण में 212 एजुकेटर रुकेंगे।  यह बताया गया है कि को-लोक रेटेड वैलीवाड़ी कर्मचारी पर आधारित है।

  इसके लिए प्रमाणित विश्वविद्यालय से होम साइंस में स्नातक करने वाले स्कूटर आवेदन कर सकते हैं।  इसके साथ ही कोचिंग टीचर ट्रेनिंग (एनटीटी) या सीट असिस्टेंट इंजीनियर अभ्यर्थी भी शामिल हो सकते हैं।  इसके अलावा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद से स्नातक योग्यता वाले भी पात्र होंगे।

इन योग्यताओं का होना जरूरी

एजुकेटर बनने के लिए केवल डिग्री ही नहीं बल्कि कुछ आरक्षण भी पूरी तरह से जरूरी है।  इसमें न्यूनतम आयु 21 वर्ष और अधिकतम आयु 40 वर्ष निर्धारित है।  आवेदन केवल उत्तर प्रदेश के स्थायी निवासी ही कर पाएंगे।  जारी अधिसूचना के अनुसार किसी भी प्रकार का अनुभव अनिवार्य नहीं होगा।  यह नियम पूरे प्रदेश के सभी अछूतों पर लागू होगा।

एजुकेटर बनने के लिए आवेदन प्रक्रिया

जो भी युवा शिक्षक शामिल होना चाहते हैं, उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार के सेवायोजना पोर्टल पर पंजीकरण कराना होगा।  पंजीकरण के बाद आवश्यक दस्तावेज़ अपलोड करना होगा।  प्रक्रिया पूरी तरह से लेने के बाद प्री-प्राइमरी स्कोल में एजुकेटर के लिए आवेदन किया जा सकता है।  विस्तृत जानकारी पोर्टफोलियो पोर्टल पर देख सकते हैं।

 

प्राइमरी टीचर नोटिफिकेशन हुआ जारी, शिक्षक बनने का मिला सुनहरा मौका अभ्यर्थियों के लिए अच्छी खबर

 DSSSB Primary Teacher Notification Update के लाखों युवाओं के लिए बड़ी खुशखबरी है डीएसएसएसबी ने आखिरकार लंबे इंतजार के बाद प्राथमिक शिक्षक भर्ती 2025 का नोटिस जारी कर दिया है इस बार कुल 1180 पदों पर भर्ती होगी यह मौका सिर्फ दिल्ली के ही नहीं बल्कि पूरे देश के उम्मीदवारों के लिए सुनहरा अवसर हैl



कब से शुरू होंगे आवेदन

इस भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन 17 सितंबर 2025 से शुरू होंगे और 16 अक्टूबर 2025 तक फॉर्म भरे जा सकेंगे उम्मीदवारों को आधिकारिक वेबसाइट से ही आवेदन करना होगा इसके बाद लिंक बंद कर दिया जाएगा

कितने पदों पर होगी भर्ती

प्राथमिक शिक्षक के लिए कुल 1180 पदों पर भर्ती होगी इसमें 1055 पद शिक्षा निदेशालय में और 125 पद नई दिल्ली नगर परिषद में रखे गए हैं रिक्तियों में सामान्य ओबीसी एससी एसटी और ईडब्ल्यूएस वर्गों के लिए अलग अलग आरक्षण है

शैक्षिक योग्यता क्या होनी चाहिए

उम्मीदवारों को बारहवीं पास होने के साथ डीएलएड या बीएलएड या समान डिग्री होनी चाहिए इसके साथ ही केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा सीटीईटी पेपर 1 पास होना जरूरी है

आयु सीमा और अन्य शर्तें

उम्मीदवारों की अधिकतम आयु सीमा 30 साल रखी गई है हालांकि आरक्षित वर्गों को सरकार के नियम के अनुसार छूट दी जाएगी

अन्य राज्यों के उम्मीदवार भी कर सकेंगे आवेदन

इस भर्ती में सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों के उम्मीदवार भी आवेदन कर पाएंगे इस वजह से यह भर्ती पूरे देश के युवाओं के लिए बड़ा अवसर है

कैसे होगा चयन

डीएसएसएसबी इस भर्ती के लिए लिखित परीक्षा कराएगा परीक्षा की तिथि और बाकी जानकारी समय समय पर बोर्ड की वेबसाइट पर दी जाएगी।

TET for Teacher's: टीचर्स डे से पहले शिक्षकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, नौकरी बचानी है तो पास करनी होगी ये परीक्षा

सुप्रीम कोर्ट की ओर से जस्टिस दिपांकर दत्ता और ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने 1 सितंबर को शिक्षक पात्रता परीक्षा के संबंध में बड़ा निर्णय दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि जिनके पास 5 साल से अधिक की सेवा बची है, उन्हें अनिवार्य रूप से TET पास करना होगा। टीईटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश शिक्षा प्रणाली में गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि जिन शिक्षकों की सेवा सेवानिवृत्ति में सिर्फ 5 साल से कम शेष है, वे बिना TET पास किए भी कार्यरत रह सकते हैं। 


टीईटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जो शिक्षक परीक्षा पास नहीं कर पाएंगे, वे या तो सेवा छोड़ सकते हैं या फिर अनिवार्य सेवानिवृत्ति लेकर टर्मिनल बेनिफिट्स (सेवा लाभ) प्राप्त कर सकते हैं। यह फैसला तमिलनाडु और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों से आई याचिकाओं को लेकर दिया गया है।

बता दें कि नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) ने 2010 में यह न्यूनतम योग्यता तय की थी कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों को नियुक्ति के लिए TET पास करना जरूरी होगा। इसके बाद से ही यह परीक्षा किसी भी अध्यापक की शिक्षण गुणवत्ता सुनिश्चित करने का माध्यम मानी जाती है।

क्या अल्पसंख्यक संस्थानों में भी चलेगा TET वाला नियम?

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि क्या राज्य सरकारों की ओर से अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाने वालों पर भी TET अनिवार्य कर सकती है और यह उनके अधिकारों को किस हद तक प्रभावित करेगा, इस बारे में फैसला अब बड़ी बेंच करेगी। यानी सुप्रीम कोर्ट की ही बड़ी बेंच के पास यह केस रेफर कर दिया गया है।

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